Title: Save Our Tigers | Join the Roar
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7 Feb
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7 Jan
पहले स्नान के लिए सज गया हरिद्वार
देहरादून, 7 जनवरी। उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद पहली बार राज्य में आयोजित होने वाले महाकुंभ के अवसर पर हरिद्वार में बनाई गई टेंटनगरी 14 जनवरी को पहले स्नान के लिए पूरी तरह से सज-धज कर तैयार है। हरिद्वार में करीब साढे पांच अरब रुपये की लागत से जहां 75 प्रतिशत कार्य स्थाई प्रति के कराए गए हैं वहीं 25 प्रतिशत कार्य टेंटनगरी को बसाने के लिए कराए गए हैं जिसमें साधु संतों और स्नानार्थियों का जमावड़ा अभी से शुरू हो गया है। राज्य सरकार ने देहरादून टिहरी पौड़ी और हरिद्वार जिलों के हिस्सों को मिला कर करीब 130 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को महाकुंभ क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया है। महाकुंभ का आयोजन प्रमुख रूप से मुनि की रेती ऋषिकेश हरिद्वार और ज्वालापुर के क्षेत्रों में गंगा किनारे किया जा रहा है। मेलाधिकारी आनंद वर्धन ने बताया कि 14 जनवरी को मकर संक्राति के अवसर पर होने वाले स्नान की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और स्नानार्थियों को किसी प्रकार की दिक्कत का सामना न करना पडे इसके लिए मेला क्षेत्र में प्रवेश करने वाले सभी रास्तों के लिए एक विस्तृत कार्य योजना को अंतिम रूप दे दिया गया है। कुंभ मेले में सुरक्षा की ²ष्टि से मेला क्षेत्र के पहाड़ी हिस्सों में अब तक 39 क्लोज सर्किट कैमरे लगाए गए हैं। इनमें से ऋषिकेश क्षेत्र में 11, मुनि की रेती के क्षेत्र में 12 लक्ष्मणझूला क्षेत्र 10 और नीलकंठ क्षेत्र में छह कैमरे लगाए गए हैं। बर्धन ने बताया कि करीब चार महीने चलने वाले महाकुंभ के दौरान पहला स्नान 14 जनवरी मकर संक्राति को होगा जबकि दूसरा स्नान इसके ठीक दूसरे दिन 15 जनवरी को सूर्यग्रहण के अवसर पर मौनी अमावस्या के दिन होगा। महाकुंभ का तीसरा स्नान 20 जनवरी को बसंत पंचमी के दिन चौथा स्नान 30 जनवरी को माघ पूर्णिमा के दिन सम्पन्न होगा। महाकुंभ का प्राण कहा जाना वाला पहला शाही स्नान 12 फरवरी को महाशिव रात्रि के अवसर पर और दूसरा शाही स्नान 15 मार्च को सोमवती अमावस्या के दिन और तीसरा शाही स्नान 14 अप्रैल बैशाखी के दिन होगा। इसके अतिरिक्त 16 मार्च को नव संवतारंभ 24 मार्च को श्रीराम नवमी 30 मार्च को चौत्र पूर्णिमा और 28 अप्रैल को बैशाख पूर्णिमा का स्नान होगा। विभिन्न स्नान पर्वो पर आने वाले श्रद्घालुओं की भारी संख्या को देखते हुए पूरे इलाके को 31 सेक्टरों में बांटा गया है और प्रत्येक सेक्टर में एक सेक्टर मजिस्ट्रेट की तैनाती की गई है जिसके नियंत्रण में पूरे मेला का संचालन किया जाएगा। सभी सेक्टरों में चिकित्सा सुरक्षा खाद्य आवास की व्यवस्था पूरी कर ली गई है। कुछ ही स्थान ऐसे हैं जहां अभी टेंट लगाए जा रहे हैं और वहां बिजली व्यवस्था का काम भी युद्घस्तर पर जारी है। महाकुंभ के दौरान पडऩे वाले आठ स्नान पर्वो और तीन शाही स्नान पर्वो के दौरान सुरक्षा की चाक चौबन्द व्यवस्था की गई है। पूरे हरिद्वार मेला क्षेत्र में जमीन और जल के रास्ते लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, वहीं हेलीकाप्टरों से सुरक्षाकर्मी पूरे मेला क्षेत्र पर चौकस ²ष्टि रखेंगे। राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने बताया कि सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार की कोताही नहीं की जाएगी और लोगों को सुरक्षित स्नान कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। महाकुंभ का पहला स्नान आगामी 14 जनवरी को मकर संक्राति के अवसर पर होगा। इस दिन से ही मेला प्रारंभ हो जाएगा और करीब पचास लाख की संख्या में लोग इस अवसर पर गंगा में स्नान कर पुण्य लाभ लेने आएंगे। मेला क्षेत्र के पुलिस उपमहानिदेशक आलोक शर्मा ने बताया कि मकर संक्रांति के अवसर पर केंद्रीय सुरक्षाबल की आठ कंपनी रैपिड एक्शन फोर्स की दो कंपनी और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल की चार कंपनियों को विशेष तौर पर तैनात किया जाएगा। उन्होंने बताया कि इसके अतिरिक्त सीमा सुरक्षा बल और भारत तिब्बत सीमा पुलिस की तीन-तीन कंपनियों को भी तैनात किए जाने की योजना है।
7 Jan
एक मुख्यमंत्री जो विकास को कविता मानता है
रमेश पोखरियाल निशंक जब दिल्ली आते भी हैं तो खामोशी से मेल मुलाकाते कर के निकल जाते हैं। न कोई खबर बनती हैं और न पत्रकारों का काफिला उनके आस पास जमा होता है। निशंक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हैं और यह बताना इसलिए जरूरी है कि वे और उनका जनसंपर्क विभाग दिल्ली में किसी को यह बताने में असाधारण और अप्रत्याशित संकोच करता है। भाजपा शासित प्रदेशों मे निशंक शायद सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री है। उनका जन्मदिन पूरा देश मनाता है क्योंकि वे 15 अगस्त 1958 को पैदा हुए थे। पौड़ी गढ़वाल जिले के पिनानी गांव से निकल कर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने तक निशंक का सफर काफी चैकाने वाला है। चैकाने वाली बात यह भी है कि मुख्यमंत्री की शपथ लेने तक निशंक राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार भी थे और उनके अखबार सीमांत वार्ता को उनके तमाम राजनैतिक संपर्कों के बावजूद कोई खास विज्ञापन आज तक नहीं मिलते। 33 साल की उम्र में पहली बार वे तत्कालीन उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए कर्ण प्रयाग से तीन बार लगातर निर्वाचित हुए और 1997 की उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें उत्तरांचल के विकास का जिम्मा दिया गया था। 2002 में उन्होंने चुनाव क्षेत्र बदला और हार गए मगर जिद्दी इतने कि अगला चुनाव भी 2007 में उसी नई विधानसभा क्षेत्र से लड़ा और धमाके से जीते। निशंक कवि भी हैं और इस नाते वे कवि प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी के सच्चे राजनैतिक वंशज कहे जा सकते हैं। राजनीति निशंक के लिए जीवन मरण का प्रश्न नहीं हैं। लेकिन उत्तराखंड की उतार चढ़ाव वाली राजनीति में जब एक बेदाग छवि वाले और राजनीति में कुटिलता से दूर रहने वाले नेता की जरूरत थी तो निशंक को चुना गया। वरना निशंक तो प्रतियोगिता में भी नहीं थे। अब बात 1989 की। तब निशंक संघ से जुड़े थे लेकिन राजनीति में नहीं थे। हिंदी के सिद्व कवि बाबा नागर्जुन उत्तराखंड में खटिमा घूमने गए थे। कटिमा हिंदी काॅलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष श्री वाचस्पती के घर बाबा नागार्जुन ठहरे थे और कविताएं सुनाते रहते थे। उत्तराखंड में लेंस डाउन के पास जहरीखाल पर भी उन्होंने एक पूरी कविता लिखी थी। इसी जहरीखाल में बाबा नागार्जुन के शब्दों में रमेश निशंक नाम का एक लड़का अक्सर अपनी कविताएं सुनाने आया करता था। बाबा ने इस बालक को कविता के शिल्प के बारे में कई ज्ञान दिए। मगर बाबा नागार्जुन ही कहते थे कि यह लड़का बहस बहुत करता था। लेकिन सारी बहस साहित्यिक होती थी। राजनीति उसमें कहीं नहीं आती थी। दुभाग्र्य से अपने इस कवि शिष्य को मुख्यमंत्री बना देखने से पहले बाबा संसार से चले गए। मगर निशंक कविताएं लिखते रहे और बाद में राजनीति भी करते रहे। मगर जैसे हमारे मित्र और छत्तीसगढ़ के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सरकारी बैठकों में बंधक अधिकारी स्रोताओं को कविताएं सुनाने के लिए बाध्य करते थे वैसा निशंक ने कभी नहीं किया। उनके सामने अब तो उत्तराखंड के विकास से ले कर वहां कानून और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी हैं। कम लोग जानते हैं कि निशंक के दर्जनों कविता संग्रह और कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं और कई उपन्यास और कविता संग्रह प्रकाशित होने वाले है। उनके एक कविता के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने दूसरी के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅक्टर श्ंाकरदयाल शर्मा ने ओर तीसरी के लिए एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें सम्मानित किया था और यह देशभक्ति की कविताएं थी। कोलंबो विश्वविद्यालय उन्हें डाक्टरेट दे चुका हैं। कई यूरोपिय विश्वविद्यालय सम्मानित कर चुके हंै और कई विश्वविद्यालयों में उनके साहित्य पर पीएचडी हो चुकी है या हो रही है। इनमें हालैंड विश्वविद्यालय भी शामिल हैं। देश विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उनकी रचनाएं शामिल की गई है। तो कुल मिला कर कहानी यह है कि रमेश पखोरियाल निशंक दरअसल कवि हैं और साहित्यकार हैें और शायद यही वजह है कि राजनीति में उन्हें चालबाजियों की दुनिया के बावजूद बहुत हद तक निरापद माना जाता है। उनकी ही एक कविता की एक पक्ति हैं- आज अपनों मंे पराई सी रही है जिंदगी/ मैं अनोखी दास्ता हूं कह रही है जिंदगी। रमेश पोखरियाल निशंक के सामने एक पूरे राज्य के प्रशासन की जिम्मेदारी है और एक गजब के भाषण में उन्होंने कहा था कि उत्तराख्ंाड का विकास उनके लिए एक अधूरी कविता है और इसे वे सबके साथ मिल कर पूरा करना चाहते है। भले ही इसे सिर्फ निशंक का श्रेय नहीं कहा जा सकता लेकिन यह तो सच है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने एक साथ जिन तीन राज्यों की रचना की थी उनमें से दो छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड माओवाद के प्रकोप से घिरे हुए हैं और सिर्फ उत्तराखंड हैं जहां कोई संगठित हिंसा होती नजर नहीं आ रही है। उत्तराखंड, नेपाल और चीन दोनों की सीमा पर हैं और बीच में खबरे उड़ी थी कि चीन उत्तराखंड में घुसपैठ करवा रहा है और नेपाल के माओवादी भी राज्य में घुस रहे हैं लेकिन अभी तक सरकारी स्तर पर इसकी कोई सूचना नहीं है। फिलहाल निशंक के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वह यह है कि हरिद्वार के पूर्ण कुंभ जो संसार में सबसे बड़ा धार्मिक समागम होता है उसका सफल और सुरक्षित इंतजाम कर लिया जाए। इस मेले मंे 6 करोड़ से ज्यादा लोग आने की संभावना है और केंद्र से 400 करोड़ की मदद इंतजाम के लिए केंद्र सरकार ने दी है। यह भी पहली बार हो रहा है कि कुुंभ मेले में सिर्फ तंबू नहीं लगाए जाएंगे बल्कि ऐसे स्थायी भवन बनाए जाएंगे जो बाद में काम आते रहेगे। नए राज्य बनते हंै तो संपत्तियों और परिसंपत्तियों के बंटवारे का झमेला होता ही है। उत्तराखंड भी अपवाद नहीं था। यहां तो कर्मचारियों का बंटवारा भी इतने वर्षों में नहीं हो पाया था। निशंक राजनीति को देहरादून छोड़ कर लखनऊ मायावती से बात करने चले गए और पहली सफलता यह मिली कि उत्तर प्रदेश से चार हजार पुलिसकर्मियों के पद उत्तराखंड को दे दिए गए। अब इसके अलावा उत्तर प्रदेश कुंभ के इंतजाम के लिए अपने पुलिस अधिकारी और कर्मचारी भी देगा। निशंक कविताएं भी लिख रहे हैं और फाइलों पर दस्तखत भी कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि भारत में एक सपने देखने वाला कवि मुख्यमंत्री मौजूद हैं जो विकास को कविता से जोड़ रहा है।
7 Jan
उत्तराखंड में आखिर माओवाद क्यों नहीं है
राजेंद्र जोशी
डेटलाइन इंडिया
देहरादून, 6 जनवरी- अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने तीन राज्य बनाए थे- झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल जो अब उत्तराखंड है। यह सरल स्वाभाविक हैं कि झारखंड और छत्तीसगढ़ दोनों माओवादी हत्यारों से जूझ रहे हैं और उत्तराखंड में कोई संगठित हिंसा इसके बावजूद नहीं हैं कि इसकी सीमा नेपाल और चीन दोनों से मिलती है। नवोदित राज्य उत्तराखण्ड ने वर्ष 2009 में विकास के अनेक आयाम प्राप्त किए। राज्य गठन के पश्चात पहली बार केन्द्रीय योजना आयोग से अब तक के सबसे अधिक 5575 करोड़ रूपये की योजना मंजूर कराये गये, जो गत वर्ष की तुलना में 800 करोड़ रूपये अधिक है। प्रदेश के बजट में कोई नया कर न लगाते हुए महिलाओं के लिए जेण्डर बजट में 1205 करोड़ रूपये मंजूर किए गए। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय 108 आपात सेवा का विस्तार विकासखण्ड स्तर तक किया गया। पहली बार कुम्भ के लिए 400 करोड़ रूपये की अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता प्राप्त करने के साथ ही कुम्भ मेले के अन्तर्गत 80 प्रतिशत से अधिक कार्य स्थाई प्रवृत्ति के कराये जा रहे है। गन्ना किसानों को देश के अन्दर सबसे अधिक गन्ना मूल्य दिया गया और संस्कृत को प्रदेश की दूसरी राजभाषा घोषित किया गया। गंगा की सफाई को एक अभियान के रूप में शुरू किया गया। पर्यटन, जड़ी-बूटी, उद्यान, शिक्षा, जैसे क्षेत्रों में भी अभिनव पहल करते हुए प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लिए विजन-2020 के तहत कार्य शुरू किया गया। वर्ष 2009 मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के लिए भी उपलब्धियों भरा रहा है। डाॅ. निशंक ने अपने राजनैतिक कुशलता, प्रशासनिक दक्षता और वित्तीय प्रबन्धन में खरे उतरे हैं। कवि के रूप में उनका संवदेनशील हृदय जन समस्याओं के समाधान के लिए भी संवेदनशील है। वे उत्तराखण्ड के दूर-दराज क्षेत्रों का भ्रमण कर जन समस्याओं का निस्तारण करते हैं। पूरे प्रदेश में एक साथ विद्यालयों और अस्पतालों के निरीक्षण से अब उनकी उपस्थिति में सुधार हुआ है। 27 जून, 2009 को प्रदेश के पांचवें मुख्यमंत्री के रूप में इस वर्ष डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने कार्यभार ग्रहण किया। मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के पश्चात ही सबसे पहले उन्होंने जनता से जुड़ी हुई बिजली और पानी जैसी समस्याओं के निराकरण के लिए कार्य शुरू किया और जनता की समस्याओं के निराकरण के लिए सबसे पहले पौड़ी तथा नैनीताल में जनता मिलन कार्यक्रम आयोजित कर जन समस्याओं के प्रभावी निराकरण की पहल शुरू की। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को एक नई कार्य संस्कृति के अन्तर्गत टीम भावना से कार्य करने के लिए प्रेरित भी किया। उन्होंने अधिकारियों को दफ्तरों से निकलकर क्षेत्र भ्रमण करने, दूरस्थ क्षेत्रों में रात्रि विश्राम करने और जनता से मिलकर उनकी समस्याओं के समाधान के लिए एक अभियान संचालित कराया। मंत्रियों और शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को जिले आंवटित कर इस कार्य में और तेजी लाई गई। विकासनगर उपचुनाव इस वर्ष का सबसे बड़ा राजनैतिक घटनाक्रम था। अपने कुशल राजनैतिक प्रबन्धन के चलते और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर मुख्यमंत्री ने विकासनगर में अदभुत कारनामा कर दिखाया। राजनैतिक पण्डित जिस उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नये प्रत्याशी को दौड़ में ही शामिल नहीं मान रहे थे उसे मुख्यमंत्री ने जिताकर सभी को चकित कर दिया। इस चुनाव से उन्होंने यह भी साबित किया कि बेहतर प्रबन्धन और सबको साथ लेकर चलने से कोई भी हारी हुई बाजी जीती जा सकती है। डा. निशंक ने इस वर्ष मुख्यमंत्री के तौर पर अपना पहला बजट पेश किया और इस बजट में जनता पर कोई नया कर न लगाकर राहत देने के साथ ही आम व्यक्ति के दैनिक उपयोग की खाद्य सामग्री को भी कर मुक्त किया। अपने राजनैतिक कौशल का परिचय देते हुए उन्होंने केन्द्रीय योजना आयोग से वार्षिक योजना के लिए 5574.70 करोड़ रूपये की धनराशि मंजूर कराई। महिलाओं के लिए राज्य के बजट में अनेक सुविधाएं दी गई और गत वर्ष के 333 करोड़ रूपये के जेण्डर बजट को बढ़ाकर 1205 करोड़ रूपये किया। मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार स्तर पर लम्बित विभिन्न योजनाओं के लिए केन्द्रीय मंत्रियों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, केन्द्रीय योजना ओयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, स्वास्थ मंत्री गुलाम नबी आजाद सहित सभी मंत्रियांे से मिलकर प्रदेश के विकास के सम्बन्धी योजनाओं के लिए वार्ता की। इसके सार्थक परिणाम भी सामने आये। केन्द्र सरकार पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उत्तराखण्ड को ग्रीन बोनस देने पर विचार कर रही है। कैम्पा के अंतर्गत प्रतिपूर्ति के रूप में 80 करोड़ रूपये अभी तक प्राप्त हुए हैं। इसके साथ ही प्रदेश में समेकित जलागम विकास कार्यक्रमों के लिए 37 करोड़ रूपये अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता भी प्राप्त की। देश एवं दुनिया के सबसे बड़े कुम्भ मेले में आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस मेले में लगभग 6 करोड़ लोगों के आने का अनुमान है। मेले की व्यवस्था के लिए केन्द्र से 400 करोड़ रूपये अतिरिक्त सहायता स्वीकृत कराने में सफलता मिली। मुख्यमंत्री ने मेला क्षेत्र में दिन रात निर्माण कार्य कराए गए। गुणवत्ता पर विशेष ध्यान रखा गया। इसके लिए थर्ड पार्टी व्यवस्था की गई। पहली बार कुम्भ मेले के लिए 80 प्रतिशत स्थाई प्रवृत्ति के निर्माण कार्य कराये जा रहे है। इन निर्माण कार्याें का इस्तेमाल कुम्भ मेला सम्पन्न होने के बाद भी किया जायेगा। केन्द्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने लक्सर से लेकर ऋषिकेश तक कुम्भ के लिए किए जा रहे कार्यों का स्थलीय निरीक्षण किया। इस टीम में केन्द्रीय योजना आयोग की सचिव सुधा पिल्लै, प्रधानमंत्री कार्यालय के निदेशक अमित अग्रवाल, गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव डी. के. कोटिया ने कुम्भ मेले के लिए की जा रही उत्तराखण्ड सरकार की तैयारियों की सराहना की। डा. निशंक उत्तराखण्ड के पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्हांेने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के मध्य लम्बित परिसम्पत्तियों और कार्मिकों के बंटवारे के समाधान के लिए लखनऊ जाकर वहां की मुख्यमंत्री से मुलाकात की। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से वार्ता करने के बाद विभिन्न मुद्दों पर सहमति बनी। उत्तर प्रदेश से उत्तराखण्ड के लिए आवंटित 4 हजार पुलिस कर्मी जो उत्तराखण्ड नहीं आये उनके पदों को हस्तान्तरित करने पर सहमति बनी। अब उत्तराखण्ड अपने स्तर पर इन 4 हजार पुलिसकर्मियों की नई भर्ती कर सकेगा। मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश से कुम्भ मेले के लिए जितने भी पुलिस अधिकारियों और कार्मिकों की मांग की, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उसे देने पर सहमति व्यक्त की। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के मेडिकल कालेजों में पी.जी. के 16 पद उत्तराखण्ड के अभ्यर्थियों को मिलेेगे। उत्तराखण्ड में पड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग की 16 एकड़ जमीन जो अब तक उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के पास थी, उसे भी उत्तराखण्ड को हस्तान्तरित किया जायेगा। शेष प्रकरणों के निदान के लिए दोनो प्रदेशों के मुख्य सचिव के मध्य मासिक बैठक की व्यवस्था की गई। राज्य में सम्भावित 40 हजार मेगावाट जल विद्युत क्षमता के सापेक्ष अब तक 3146 मेगावाट विद्युत क्षमता सृजित हुई है। ग्यारवीं पंचवर्षीय योजना में 5194 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। 120 मेगावाट ब्यासी जल विद्युत परियोजना पर कार्य चल रहा है। किसाऊ बांध परियोजना के लिए केन्द्र सरकार से सैद्धान्तिक सहमति प्राप्त हो गई है। इसके साथ ही बिजली लाईनों और उपस्थानों के निर्माण के लिए 500 करोड़ रूपये तथा लघु जल विद्युत परियोजनाओं के लिए 150 करोड़ रूपये की धनराशि स्वीकृत कराने में सफलता बनी। किसाऊ बांध परियोजना के लिए केन्द्र सरकार से सैद्धान्तिक सहमति प्राप्त हो गई है। पंचेश्वर बांध परियोजना के लिए निरन्तर प्रयास किए जा रहे हैं। इसके साथ ही बिजली लाईनों और उपस्थानों के निर्माण के लिए 500 करोड़ रूपये तथा लघु जल विद्युत परियोजनाओं के लिए 150 करोड़ रूपये की धनराशि स्वीकृत कराने में सफलता बनी। जीवनदायिनी पण्डित दीनदयाल उपाध्याय 108 आपात सेवा का विस्तार प्रत्येक विकासखण्ड स्तर तक करके लाखों लोगों को नया जीवन दिया है। इस सेवा के माध्यम से महिलाओं के प्रसव सम्बन्धी मामलों में सहायता देकर लगभग 80 हजार जच्चा-बच्चा के जीवन की रक्षा की। 108 की चलती हुई एम्बूलेंस में केवल डेढ़ वर्ष में 1 हजार से अधिक बच्चों को जन्म देकर उत्तराखण्ड ने विश्व रिकार्ड बनाया है। सभी बी.पी.एल. परिवारों को सरकारी चिकित्सालयों में निःशुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में हैल्थ कार्ड जारी किए गए हैं। श्रीनगर में मात्र 15 हजार रूपये वार्षिक फीस पर एमबीबीएस की डिग्री दी जा रही है। श्रीनगर मेडिकल कालेज स्थापित करने के बाद अब अल्मोड़ा में भी मेडिकल कालेज का निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया है। डा. सुशीला तिवारी फोरेस्ट मेडिकल कालेज के राजकीयकरण तथा उधमसिंह नगर में नए मेडिकल कालेज का निर्णय लिया गया है। देहरादून के जिला चिकित्सालय तथा महिला चिकित्सालय को भी मेडिकल कालेज का दर्जा दिलाए जाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के लिए आयुर्वेद विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही आयुष ग्रामों की स्थापना की जा रही है। उत्तराखण्ड सरकार ने देश में सर्वाधिक गन्ना मूल्य देने के साथ ही गन्ना किसानों के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। सरकार ने निगमों, परिषदों, प्राधिकरणों तथा विश्वविद्यालय के शिक्षणेत्तर कर्मियों को भी छठे वेतनमान का लाभ दिया है। गढ़वाल विश्वविद्यालय के 786 कर्मियों को नियमित किया गया है। इसके साथ ही पौड़ी में पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए 4 करोड़ रूपये की स्वीकृति प्रदान की गई। इसके साथ ही औद्योगिक विकास के लिए तेजी से कार्य किया जा रहा है। अब तक 237 उद्योगों द्वारा नए उद्योग स्थापित करने की सहमति प्राप्त हुई है, जिसके माध्यम से 4431 करोड़ रूपये का पूंजीनिवेश होगा। मुख्यमंत्री के प्रयासों से पौड़ी में नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ टैक्नोलाॅजी की स्थापना के लिए भूमि का चयन कर लिया गया है। इसके साथ ही इण्डियन इंस्टिट्यूट आॅफ मैनेजमेंट की स्थापना के लिए भूमि के चयन की कार्यवाही प्रगति पर है। उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य है जिसने देववाणी संस्कृत को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया। संस्कृत पठन-पाठन करने वाले अध्यापकों और छात्रों को पुरस्कृत करने की भी योजना है। इसके साथ ही समाज के वंचित वर्ग के छात्रों को उत्कृष्ट शिक्षा देने के लिए देवभूमि मुस्कान योजना तथा कूड़ा बटोरने वाले बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा के लिए पहल योजना शुरू की गई है। सरकार ने वर्तमान शैक्षिक सत्र से 20 नए राजकीय पालिटैक्निक संस्थानों की स्थापना की है। प्रसिद्ध साहित्यकार शैलेश मटियानी के नाम से राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार योजना भी शुरू की गई है। विकास की अनेक योजनाओं पर तीव्र गति से कार्य चल रहा है। पर्यटन को प्रदेश की आर्थिकी का आधार बनाने, हमारे रले, सड़क कनैक्टीविटी को सुदृढ़ कर प्रदेश को देश का आदशर्् राज्य बनाने की दिशा में सरकार लगातार कार्य कर रही है
19 Dec
बंजर खेतों में फूलों की खेती से बदलेगी किसानों की तकदीर
बंजर खेतों में फूलों की खेती से बदलेगी किसानों की तकदीर
पुष्प उत्पादन बनेगा राज्य में आर्थिकी की रीढ़
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। प्रदेश के धार्मिक महत्व को देखते हुए प्रदेश सरकार में कृषि मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने गेंदा फूल के साथ ही अन्य प्रजाति के पुष्प उत्पादकों को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया है साथ ही कुम्भ मेले को देखते हुए गेंदे का समर्थन मूल्य भी घोषित कर दिया है। प्रदेश के इतिहास में यह इस तरह का पहला निर्णय है। प्रदेश के कृषि मंत्रालय ने गेंदे का समर्थन मूल्य दस रुपये प्रति किलोग्राम घोषित किया है। प्रदेश के कृषि मंत्रालय तथा कृषि मंत्री का मानना है कि इससे प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में बंजर पड़े खेतों में फूलों की फसलें तो लहलहाएंगी ही साथ ही इससे खेती बाड़ी छोड़ चुके किसानों की आय का भी फूल एक सशक्त माध्यम बनेंगे। उन्होने बताया कि चारधाम यात्रा मार्ग पर स्थिति गांवों के किसानों को इन फूलों के बीज निशुल्क दिए जाने की योजना बनायी गयी है। वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में बहुतायत में पैदा होने वाले माल्टा का समर्थन मूल्य भी सरकार ने बढ़ाकर चार से छह रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया है। कृषि मंत्री ने बिग डेरी योजना, अंगोरा फार्म, भराड़ीसैंण के गाय प्रजनन केंद्र के संबंध में भी कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। कृषि मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भावी योजनाओं की जानकारी देते हुए बताया कि प्रदेश में पहली बार चार जिलों में की गई उद्यान विकास यात्रा के दौरान अनेक निर्णय किए गए हैं। टिहरी जिले के मलेथा गांव जो श्रीनगर देवप्रयाग मुख्यमार्ग पर स्थित है के लिये समन्वित कृषि का माडल तैयार किया जा रहा है। यह क्षेत्र कृषि की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। संरक्षित खेती के तहत फल, फूल व सब्जी उत्पाद के लिए बीस हजार छोटे पाली हाउस स्थापित किये जाने की भी योजना बनायी गयी है। किसानों को फल, फूल के पौधों की अच्छी फसल तैयार करने के लिए तीन वर्षीय कार्ययोजना शुरू की जा रही है । उद्यान एवं कृषि मंत्री ने बताया कि चमोली जिले के के भराड़ीसैंण स्थित विदेशी गाय प्रजनन केंद्र में कम दूध देने वाले पशुओं की नीलामी की जाएगी जबकि ग्वालदम के अंगोरा फार्म के अनुपयोगी होने पर इसे बंद करने पर विचार किया जा रहा है, जबकि फार्म की चार एकड़ भूमि किसानों की मांग पर केंद्रीय विद्यालय को दी जाएगी। उन्होने बताया कि कोटद्वार की बंद पड़ी फ्लश डोर फैक्ट्री को जीएमवीएन से कृषि विभाग को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। उन्होंने बताया कि पुराने सरकारी उद्यानों की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाई गई है। ताकि इनका प्रयोग और अधिक उत्पादन के लिये किया जा सके। उन्होने बताया कि प्रदेश में आलू का समर्थन मूल्य 14 रुपये प्रति किलो किया गया है। उन्होने बताया कि प्रदेश में स्थापित पुराने केनिंग सेंटरों की नये सिरे से समीक्षा की जा रही है। इसके लिए भी एक कमेटी गठित की गई है जो इनका व्यापक अध्ययन कर सरकार को रिपोर्ट देगी ताकि इनका भी उपयोग किया जा सके
19 Nov
सबसे पुरानी अल्पसंख्यक जनजाति राजी की राजी बोली होने वाली है गुम
वक्त की अंधी सुरंग में गुम हो जाएगी राजी बोली
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। किसी भी भाषा बोली के बचे रहने की गारंटी क्या होती है, यह कि उसकी भावी पीढ़ी उसको बोले। मगर उत्तराखंड की सबसे पुरानी अल्पसंख्यक जनजाति राजी की राजी बोली वक्त की अंधी सुरंग में गुम हो जाने वाली है। वजह साफ है उसके 20 प्रतिशत बच्चे अपनी बोली में बातचीत करना ही पसंद नहीं करते क्योंकि वे समझते हैं कि अपने पूर्वजों की बोली की बजाय कुमाऊंनी बोलना ज्यादा फायदेमंद है। 60 प्रतिशत लोग अपनी बोली के प्रति बेपरवाह हैं, जबकि केवल 20 प्रतिशत को अपनी बोली में बात करना भाता है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में राजी या वनरावतों की आबादी महज 517 है। यह छोटी-सी खानाबदोश जनजाति नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों में रहती है। इसके महज पांच फीसदी लोग ही साक्षर हैं। ऐसे में राजी बोली का केवल मौखिक रूप जीवित है। हाल में ही दून आईं लखनऊ विश्वविद्यालय की रीडर डा$ कविता रस्तोगी का सर्वेक्षण इस बोली के अंधेरे भविष्य की ओर संकेत करता है। डा$रस्तोगी के सर्वे के अनुसार 90 प्रतिशत राजियों का मानना था कि राजी बोलने से कोई फायदा नहीं, जबकि 60 फीसदी को अपनी जबान से कोई मतलब ही नहीं था। 26 से 35 साल के 65 फीसदी तो 16 से 25 साल के 60 फीसदी युवाओं को अपनी भाषा में बोलना पसंद नहीं। 26 से 35 साल के 40 प्रतिशत लोगों को अपनी भाषा संस्$ति पर कोई गर्व नहीं तो, 16 से 35 साल के 80 फीसदी तो 36 से 45 साल के 70 फीसदी राजी नहीं मानते कि राजी बोलना अच्छा है। डा$ रस्तोगी के मुताबिक दरअसल राजी लोगों में धीरे-धीरे अपनी भाषा-संस्$ति के प्रति हीनताबोध घर कर रहा है। इसलिए वे धीरे-धीरे कुमाउंनी या हिंदी पर निर्भर होते जा रहे हैं। राजी लोग अपनी बोली का 84 फीसदी इस्तेमाल धार्मिक कर्मकांड के दौरान ही करते हैं। बोली का घरों में 75 फीसदी तो दूसरे स्थानों पर केवल 30 फीसदी ही इस्तेमाल होता है। राजी बोली पर देश में पहली पीएचडी करने वाले भाषा विज्ञानी डा$ शोभाराम शर्मा का कहना है कि किसी भी भाषा बोली के जिंदा रहने के लिए उसके बोलने वाले समाज का उसके प्रति झुकाव और उसकी भौतिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। उन्होंने बताया के पिछली कांग्रेस सरकार ने राजी जनजाति पर संकट भांपते हुए जनजाति के लोगों को ज्यादा संतान पैदा करने पर पुरस्$त करने और सुविधाएं मुहैया कराने की घोषणा की थी लेकिन उसका क्या हुआ पता नहीं। जिन भाषाओं में जीविका का जुगाड़ नहीं होता वे मर जाती हैं। राजी बोली का खत्म होना देश ही नहीं दुनिया की अपूरणीय क्षति होगा। सरकार को चाहिए कि वह भाषाई विविधता की रक्षा के लिए राजी जनजाति और उनकी बोली के संरक्षण के लिए प्रयास करें।
17 Nov
बढ़ रहे हैं हिमालयी ग्लेशियर
देहरादून। जलवायु परिवर्तन के हो-हल्ले के बीच पश्चिमी हिमालय के कुछ ग्लेशियर ग्लोबलवार्मिंग के सिद्घांत को धता बता रहे हैं। इतना ही नहीं पिछले आधे दशक से चिंता का सबब बन चुके गंगोत्री, चोरबाड़ी आदि ग्लेशियरों के सिकुडऩे की गति भी मंद पड़ चुकी है। इंटरनेशनल पैनल फार क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट हालांकि दावा करती है कि 1962 से 2004 तक हिमालय के 1000 ग्लेशियर 16 प्रतिशत सिकुड़ गए हैं और तिब्बत के पठार के ज्यादातर ग्लेशियर हालांकि सिकुड़ रहे हैं मगर अध्ययन कहते हैं कि पश्चिमी हिमालय की हिंदूकुश और कराकोरम पर्वत श्रृंखलाओं के 230 ग्लेशियरों का समूह लगातार विस्तार ही नहींकर रहा, बल्कि उन पर जमी बर्फ की परतें भी मोटी हो रही हैं। 1960 से अब तक के सेटेलाइट चित्रों के अध्ययनों के मुताबिक पाकिस्तान के-2 और नंदा पर्वत के ग्लेशियर पिछले 30 साल यानी 1980 से लगातार आगे बढ़ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के ड्रुंग-डु्रंग और कांग्रिज ग्लेशियर पिछले 100 सालों में एक इंच भी नहींखिसके हैं तो पिछले 50 सालों में सियाचिन भी नहीं सिकुड़ा, वर्ष 2000 के बाद गंगोत्री के सिकुडऩे की रफ्तार थमी है तो भगीरथ खर्क और जेमू ग्लेशियर की भी यही स्थिति है। अध्ययनों के मुताबिक उत्तर पश्चिमी हिमालय यानी कश्मीर के जांस्कर और सियाचिन ग्लेशियर उस रफ्तार से नहींपिघल रहे जैसा कि उत्तर पूर्वी हिमालय के हिमनद। दून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट अफ हिमालयन जियोलजी के हिमालयी हिमनद अध्ययन केंद्र के सलाहकार और जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया के पूर्व उपमहानिदेशक डा$ दीपक श्रीवास्तव पिछले 25-30 वर्षो से ग्लेशियरों का अध्ययन कर रहे हैं। ड$ श्रीवास्तव का कहना है कि अफगानिस्तान से अरुणाचल तक फैले विस्तृत हिमालय में कुल मिलाकर 9575 छोटे बड़े ग्लेशियर हैं। हिमालय की जलवायु को तीन मोटे हिस्सों के तौर पर देखा जा सकता है। पश्चिमी हिमालय यानी पाकिस्तान से हिमाचल तक का मौसम जहां पश्चिमी विक्षोभ पर निर्भर है उत्तराखंड व नेपाल हिमालय पर पश्चिमी विक्षोभ की बजाय मानसून का ज्यादा असर पड़ता है। पूर्वी हिमालय यानी सिक्किम और अरुणाचल का मौसम पूरी तौर पर मानसून से प्रभावित होता है। इन मौसम तंत्रों में बदलाव का असर ग्लेशियरों पर भी पड़ता है। वह कहते हैं कि सेंटर के पास अभी 60 ग्लेशियरों के अध्ययन आंकड़ें हैं जो बताते हैं कि ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं मगर अभी यह अध्ययन नहीं हो सका है कि यह मानवीय गतिविधियों व जलवायु परिवर्तन की वजह से ही हो रहा है। वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलजी के जाने माने ग्लेशियर विज्ञानी डा$ डीपी डोभाल का कहना है कि हिमालयी ग्लेशियर किस ढलान पर है और उन पर रहने वाली धूप का भी उनकी पिघलने की गति पर असर पड़ता है। दुनिया में और भी हैं बढ़ते ग्लेशियर दुनिया में सिकुड़ते ग्लेशियरों की रिपोर्टो के बीच नार्वे, कनाडा, दक्षिणी अमेरिका, किर्गिजिस्तान, न्यूजीलैंड, रूस और अलास्का के सैकड़ों ग्लेशियर तेजी से बढ़ रहे हैं। ग्रीनलैंड का एक ग्लेशियर तो 12 किमी प्रति वर्ष की गति से बढ़ रहा है।
13 Nov
पराये मुल्क में जान गंवाते मेहमान परिंदे

देहरादून। अनुकूल वातावरण तथा भोजन की तलाश में अपने वतन से दूर हजारों किलोमीटर की लम्बी यात्रा करके यहां के जलाशयों में आने वाले मेहमान परिंदे हर वर्ष शिकारियों के हाथों अपनी जान गंवा देते है। प्रवासी पक्षियों की तेजी से घटती संख्या से पर्यावरणविद् एवं पक्षी प्रेमी खासे चिंतित हैं। पिछले दशक तक अच्छी खासी तादात में आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या अब धीरे-धीरे कम होने लगी है। उत्तराखण्ड के संरक्षित एवं आरक्षित वन क्षेत्र से सटे कालागढ़, तुमडि़या, हरिपुरा, बौर, नानक सागर एवं शारदा सागर जलाशय तथा कोसी व रामगंगा नदियों, विकासनगर की आसन झील, हरिद्वार के भीमगौंडा, समेत गंगा नदी के कई स्थानों में शीतकाल के समय साइबेरिया व लद्दाख क्षेत्र से हजारों की संख्या में विभिन्न प्रजाति के मेहमान पक्षी अपनी प्रवास यात्रा पर आते हैं। इनमें सुर्खाब, बतासी, अबाबिल, नाइटिंगल, स्नो बंटिंग, रेड विंग, वुड काक, कबूतर, बुश चौट, नीलकंठ, फील्ड फेयर, कुर्री, बार हैडेड गीज, ह्वाइट आईज डक, टैफ्टेड डक तथा साइबेरियन सारस जल क्रीड़ा से पर्यटकों का बरवस ही मन मोह लेते है। लेकिन शिकारियों की गिद्घ दृष्टि से इनका अस्तित्व संकट में आन पड़ा है। कहीं भोजन तो कहीं शौक और पौराणिक मान्यताओं को लेकर शिकारी एवं जनजातियों द्वारा धड़ल्ले से शिकार किया जाता है। हालांकि वन महकमा इन पक्षियों के अवैध शिकार के मामले में चौकस रहता है फिर भी चोरी छिपे शिकारी इनकी जान ले ही लेते है। इन पक्षियों का सबसे अधिक शिकार तुमडि़या, हरिपुरा, नानक सागर एवं शारदा सागर जलाशयों में किया जाता है। वन विभाग के आंकड़े बताते है कि इन मेहमान परिंदों का कई बार बड़े पैमाने पर शिकार के भी प्रयास गए हैं। विश्व प्रसिद्घ संस्था बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के प्रमुख असद रफी रहमानी बताते है कि संस्था द्वारा कई वर्ष से प्रवासी पक्षियों के पैरों में छल्ले बांधकर अध्ययन किया जा रहा है जिसके नतीजे चौंकाने वाले हैं। श्री रहमानी के अनुसार अधिकांश प्रवासी पक्षी अगले वर्ष अपनी प्रवास यात्रा पर नहीं आते हैं जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। यह अध्ययन इन मेहमान परिंदों के अवैध शिकार की विभीषिका को दर्शाता है। विश्व प्र$ति निधि भारत के सीनियर प्रोजेक्ट आफीसर डा$ केडी कांडपाल ने बताया कि साइबेरिया व लद्दाख से आने वाले पक्षी उच्च हिमालयी क्षेत्र में तैनात सैनिकों तथा अफगानिस्तान के कबाइलियों के हाथों भी मारे जाते हैं। नेचर इंटरप्रिटेनर राजेश भट्ट एवं बच्ची बिष्ट का कहना है कि भारत की प्रवास यात्रा पर आने वाले पक्षी दुर्लभ श्रेणी के होते है, इसलिए इन्हें संरक्षण प्रदान करना चाहिए।
7 Nov
जुड़ेंगी उत्तराखंड के बिखरे इतिहास की कडि़यां
देहरादून। प्रदेश में पुरातात्विक अवशेषों के रूप में बिखरे उत्तराखंड के इतिहास की कडि़यां जल्द ही जुड़ जाएंगी। बिखरे इतिहास को एक सूत्र में पिरोने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई)ने पहल की है। एएसआई के देहरादून मंडल ने प्रदेश में अब तक हुए तमाम उत्खननों में पुरावशेषों के ब्योरे को संजोते हुए एक पुस्तिका के प्रकाशन करने की योजना बनाई है। इस पुस्तिका में पुरावशेषों के माध्यम से उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल से ब्रिटिश काल तक का इतिहास दर्ज होगा। यह पुस्तिका विश्व दाय सन्ताह (19 से 26 नवंबर वल्र्ड हैरिटेज वीक)में लोकार्पित की जाएगी। देश के इतिहास में अक्सर उत्तराखंड का उल्लेख नहीं के बराबर ही होता है, जबकि एएसआई के अधीक्षण पुरातत्वविद ड$ देवकी नंदन डिमरी का कहना है कि अल्मोड़ा में सुयाल नदी के दायें तट पर लखु उड्यार में प्रागैतिहासिक गुफा चित्र मिलते हैं। ये मध्य हिमालय में मिले पहले गुफा चित्र हैं। गढ़वाल मंडल की अलकनंदा घाटी के ग्वरख्या उड्यार और पिंडरघाटी के किमनी गांव में मिले गुफाचित्र भी संकेत देते हैं कि यहां प्रागैतिहासिक मानव रहता था। चंपावत के देवीधुरा में महापाषाण कालीन संस्$ति के सबूतों के तौर पर विशाल पत्थरों पर ओखलियां मिली हैं। द्वारहाट के शैलचित्र और चंद्रेश्वर मंदिर के पास, अल्मोड़ा के नौगांव, मुनिया की ढाई, जोयो गांव, गोपेश्वर के समीप पश्चिमी नयार घाटी में भी ऐसी ही ओखलियां मिली हैं। बहादराबाद में 1953 में उत्तर-प्रस्तरयुगीन या ताम्रयुग के अवशेष मिले हैं। जिनमें कई हड़प्पा से मिलते जुलते हैं। कालसी के पास भी आरंभिक पाषाणयुगीन अवशेष मिले हैं। चमोली गढ़वाल के मलारी गांव में और पश्चिमी रामगंगा घाटी महापाषाणकालीन शवाधान मिले हैं। डा डिमरी का कहना है कि सातवी सदी ईस्वी पूर्व और चौथी सदी ईस्वी के मध्य हिमालय के आद्य इतिहास का प्रमाण मुख्यतरू प्राचीन साहित्य है लेकिन उत्तरकाशी के पुरोला और देहरादून के जगतग्राम में कुणिंद शासक राजा शील वर्मन के अश्वमेध यज्ञ केप्रमाण मिले हैं। पूरे गढ़वाल में जगह-जगह बड़ी संख्या में कुणिंद वंश के सिक्के मिलते हैं। इतना ही नहीं काशीपुर नैनीताल से कुषाण शासकों कनिष्क और वासुदेव की मुनि की रेती (ऋषिकेश) से हविष्क की स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं। ड$ डिमरी के मुताबिक कुषाणों के बाद यौधेय, परवर्ती कुणिंद, छागलेश राजवंश, सिंहपुर का यदुवंश, नागवंश और फिर हर्ष के बाद कत्यूरी राजवंश के प्रमाण भी उत्तराखंड में मिलते रहे हैं। गढ़वाल के पंवार व कुमाऊं के चंद वंश ने तो 18वीं सदी तक राज किया। ड$ डिमरी का कहना है कि 2003 में स्थापित एएसआई देहरादून मंडल द्वारा इतिहास को श्रृंखलाबद्घ करने का यह पहला प्रयास है। पुस्तिका से इतिहास के विद्यार्थियों को उत्तराखंड के क्रमिक वैज्ञानिक इतिहास का तो पता चलेगा ही। इतिहास के शोधार्थियों के लिए भी यह पुस्तिका संदर्भ पुस्तिका के रूप में लाभप्रद होगी।
4 Nov
यहां दिलवाली ले जाती है दूल्हा
राजेश पंवार
विकासनगर — सेहरा सजा के रखना, दूल्हा बनाके रखना, लेने तुझे आएंगी तेरी सजनी.. चौंक गए आप नब्बे के दशक के इस सुपरहिट गीत के बदले हुए बोल देखकर। जनाब यह बिल्कुल सच है, ऐसा होता है देहरादून जिले के जनजाति क्षेत्र जौनसार-बावर के अधिकांश गांवों में, जहां दूल्हे के बजाए दुल्हन की बारात वर पक्ष के यहां ले जाने की परंपरा अर्से से चली आ रही है। दरअसल, दहेज रहित और सादगी से भरपूर यह वैवाहिक रस्म आपको जरूर मनोरंजक लगे लेकिन समाज के उस तबके के लिए यह किसी सबक से कम नहीं, जिसके लिए विवाह का मतलब ही धन-दौलत का भौंडा प्रदर्शन व दहेज के लिए अपनी संतान को एक तरह से बेचने से है। विवाह के पारंपरिक रस्मो रिवाज के बिल्कुल उलट इस परंपरा के तहत रिश्ता जोड़ने की पहल वैसे ही होती है जैसे कि परंपरा है। मसलन, वर पक्ष, कन्या पक्ष के घर रिश्ता ले जाता है और फिर वर व कन्या पक्ष के परिजन अपने-अपने कुल पुराहितों और कुल देवता महासू देव की अनुमति लेने के बाद शादी का दिन तय करते हैं। इसके बाद वर और कन्या पक्ष के परिजन स्वयं अपने-अपने नातेदार रिश्तेदारों के घर जाकर उन्हें शादी में शामिल होने का न्योता देते हैं, हालांकि बदलते चलन के मुताबिक लोग अब निमंत्रण कार्ड के माध्यम से भी मेहमानों को आंमत्रित करने लगे हैं। विवाह की निश्चित तिथि से एक रोज पहले वर पक्ष की ओर से चाचा, मामा, भाई या पिता गांव के तीन प्रमुख व्यक्तियों को साथ लेकर कन्या पक्ष के घर जाते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में जोजोडि़या कहा जाता है। कन्या पक्ष के लिए वर पक्ष की ओर से शादी का जोड़ा, गहने, जूते व श्रंृगार आदि का सामान दिए जाने का रिवाज है। शादी के दिन दुल्हन की बारात गाजे-बाजे, ढोल-दमाऊं आदि वाद्यों के साथ वर पक्ष के घर पहुंचती है, जहां पर वर पक्ष के लोग बारातियों (जोजोडि़यों) का जोरदार स्वागत करते हैं। जोजोडि़यों के लिए गांव में अलग से डेरा दिया जाता है। वर पक्ष की ओर से दुल्हन के साथ आए बारातियों के स्वागत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाती। फेरे से लेकर विवाह की सारी रस्में दूल्हे के घर पर बने मंडप में निभाई जाती हैं। शादी के दूसरे दिन जोजोडि़या विदाई गीत छांइयां गाते हुए वापस घर लौट जाते हैं। क्षेत्र में जुलाई, अगस्त व सितंबर को छोड़ बाकी सभी माह में विवाह शुभ माना जाता है। चिल्हाड़ निवासी बुजुर्ग बर्फियानंद बिजल्वाण का कहना है कि इस प्रकार के विवाह से कन्या पक्ष पर कोई बोझ नहीं पड़ता। या यूं कहिए कि दहेजरहित शादी होती है। इसलिए यह परंपरा कायम रहनी चाहिए। वहीं, युवा खजान सिंह नेगी का कहना है कि बदलते जमाने के साथ क्षेत्र में विवाह के तौर-तरीके भी बदलने चाहिए। लड़की की बारात वर पक्ष के यहां जाना वर्तमान में सही नहीं लगता।











