पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूडी का सम्मान समारोह प्रायोजित अथवा राजनैतिक!

सम्मान समारोह प्रायोजित अथवा राजनैतिक!
राजेन्द्र जोशी
पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूडी को लगभग 10 सालों बाद सड़कों के पुर्ननिर्माण को लेकर पुरस्कृत किया जाना पूरी तरह से राजनैतिक व प्रायोजित लगता है। जनरल खण्डूडी राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व काल में कार्य कर चुके हैं। इतने वर्षों बाद सड़क निर्माण के लिए खण्डूडी को सम्मानित किए जाने पर राजनैतिक हलकों में यह मामला खासा चर्चा का विषय बन गया है। इनका कहना है कि आिखर पुरस्कृत करने वाले और पुरस्कृत होने वाले इतने सालों तक कहां सोऐ रहे। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण सड़कों से नहीं बल्कि चारित्रिक उत्थान एवं सांस्कृतिक पुर्नजागरण से होता है और पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में यह दोनो चीजें ही गायब रही। विश्लेषकों का कहना है कि जहां तक चारित्रिक उत्थान का सवाल है पूर्व मुख्यमंत्री के शासन काल में भ्रष्टाचार चरम पर था और मुख्यमंत्री के नाक के नीचें उनका लाडला सारंगी व उसकी फौज जमकर लूट मचा रही थी और जहां तक चारित्रित उत्थान का सवाल है तो पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री खण्डूडी के शासनकाल में एक ईमानदार अधिकारी सत्येंद्र दूबे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। जबकि एक जानकारी के अनुसार सत्येंद्र दूबे ने भूतल परिवहन मंत्रालय को माफियाओं से अपनी जान का खतरा बताते हुए पहले ही आगाह कर दिया था, लेकिन भूतल मंत्रालय ने उनके इस पत्र को रद्दी के टोकरी में डाल दिया। इसका यह परिणाम हुआ कि सत्येंद्र दूबे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश की राजनीति में लगभग हासिये पर खिसक चुके पूर्व मुख्यमंत्री खण्डूडी इस तरह के प्रायोजित पुरस्कारों से प्रदेश की राजनीति कि मुख्यधारा में नहीं आ सकते। इसके लिए उन्हें पदलोलुपता को तिलांजलि देते हुए सामाजिक पुर्ननिर्माण के लिए निस्वार्थ भाग से काम करना होगा। विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह योजना आयोग के उपाध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी ने बीते दिनों यह घोषणा की कि अब 70 वर्ष के बाद वे सक्रिय राजनीति से सन्यास लेंगे और पार्टी को बुजुर्ग की हैसियत से सलाह देते रहेंगे। उनका यह भी कहना है कि प्रदेश की राजनीति में अब युवाओं को अवसर दिए जाने चाहिए। ताकि ऊर्जावान लोग राजनीति में आए। प्रदेश के लोगों ने उनकी इस घोषणा को प्रदेश की राजनीति में सक्रिय लोगों ने हाथों हाथ लिया है और इसे पार्टी के लिए सकारात्मक कदम भी बताया। राजनैनिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश की जनता के खण्डूडी को बहुत ऊंचे मुकाम तक पहुंचाया और उन्हें भी जनभावनाओं का आदर करते हुए और अपने वरिष्ठ नेता मनोहर कांत ध्यानी के सिद्धांतों पर अमल करते हुए प्रदेश की सियासत में युवाओं को आगे आने का रास्ता देना चाहिए और ये पुरस्कारों के प्रायोजित समारोह का लोभ सवंरण करना चाहिए।
बहरहाल खण्डूडी को 10 साल बाद मिलें पुरस्कार से राजनैतिक नफानुकसान हुआ हो या नहीं लेकिन इस कार्यक्रम ने राजनैतिक हलकों में पूर्व मुख्यमंत्री को कोई खासा लाभ नहीं दिखाई दे रहा है।

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निशंक के बढ़ते जनाधार से परेशान हैं मुख्यमंत्री पद के दावेदार

अपने ही डुबोने पर लगे हैं भाजपा की नाव
निशंक के बढ़ते जनाधार से परेशान हैं मुख्यमंत्री पद के दावेदार
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 28 अप्रैल। भारतीय जनता पार्टी मिशन 2012 को लेकर लगातार अपना अभियान चलाए हुए है। मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के ताबडतोड़ दौरों ने भाजपा के जनाधार में जहां अप्रत्याशित वृद्धि कर दी है वहीं भाजपा के ही कुछ नेता हैं कि वे अपनी ही पार्टी के किए धरे पर पलीता लगाने पर लगे हैं।
उल्लेखनीय है कि मेजर जनरल भुवन चंद खण्डूडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश का परिणाम पांचों लोकसभा सीट पर पार्टी को मिली करारी शिकस्त के रूप में प्रदेश की जनता दे चुकी थी और प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल भाजपा आलाकमान भी भांप चुका था। यही कारण है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी से खण्डूडी को हटाया गया और ताजपोशी की गई एक युवा नेता निशंक की। कुछ दिन तो भाजपा के वे नेता मुख्यमंत्री के सुर में सुर मिलाते रहे लेकिन बाद में इन नेताओं को लगने लगा कि यदि निशंक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी पकड़ मजबूत कर दिए तो इनका राजनैतिक भविष्य चौपट हो जाएगा। सो ये नेता अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की कुर्सी के पायों को खींचने पर लग गए। इन्हें निशंक के हर कार्य बुरे लगने लगे और विपक्ष तो कम भाजपा के ये नेता निशंक के खिलाफ प्रदेश से लेकर केंद्र तक माहौल बनाने में जुट गए। लेकिन निशंक के कार्याें ने केंद्रीय आलाकमान को जहां संतुष्ट किया वहीं निशंक के कार्यों से प्रदेश की जनता में भी भाजपा के पक्ष में कम होता जनाधार भी बढ़ता गया। आज स्थिति खण्डूडी के शासनकाल से उलट है। प्रदेश में मुख्यमंत्री के ताबडतोड़ दौरों ने भाजपा के जनाधार में अप्रत्याशित वृद्धि की हैै। यह वृद्धि अचानक ऐसे ही नहीं हुई इसके पीछे डा. निशंक की कुशल कार्य क्षमता और जनता में उनकी पैठ प्रमुख रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि डा. निशंक ने 20 फरवरी के बाद प्रदेश में भाजपा के पक्ष में वह माहौल खडा कर दिया है जो कोई नेता नहीं कर सकता। प्रदेश का मुखिया राज्य बनने के बाद ऐसे-ऐसे दूर-दराज के गांवों तक पहुंचा जहां वर्तमान उत्तराखण्ड के नेता तो क्या आजादी के बाद से बने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश के नेता तक नहीं पहुंचे थे। मुख्यमंत्री निशंक ने इन दूर-दराज के गांवों के लोगों की सुध ही नहीं ली बल्कि उनकी समस्याओं को आत्मसात भी किया और दौरे से लौटने के बाद देहरादून पहुंचने पर ग्रामीणों द्वारा दिए गए पत्रों पर शासन को तुरंत कार्यवाही के निर्देश भी दिए। इससे ग्रामीणों में भाजपा सरकार के प्रति अपनापन तो पैदा हुआ ही साथ ही ग्रामीणों को यह लगने लगा है कि भाजपा सरकार उनकी खैरख्वाह है।
प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक वातावरण को यदि देखा जाए तो भाजपा के ही नेता अपनी ही सरकार के कार्यों से संतुष्ट नहीं है और वे मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा माहौल खड़ा करने की कोशिश में लगे हुए हैं जिससे पार्टी को खासी हानि उठानी पड़ सकती है। विपक्ष तो सत्ता के कार्याें को कभी भी जायत नहीं ठहराता यहां तो सत्ता पक्ष ही विपक्ष बना हुआ है।

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भाजपा की नाव निशंक के बढ़ते जनाधार से परेशान हैं मुख्यमंत्री पद के दावेदार

अपने ही डुबोने पर लगे हैं भाजपा की नाव

निशंक के बढ़ते जनाधार से परेशान हैं मुख्यमंत्री पद के दावेदार

राजेन्द्र जोशी

देहरादून, 28 अप्रैल। भारतीय जनता पार्टी मिशन 2012 को लेकर लगातार अपना अभियान चलाए हुए है। मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के ताबडतोड़ दौरों ने भाजपा के जनाधार में जहां अप्रत्याशित वृद्धि कर दी है वहीं भाजपा के ही कुछ नेता हैं कि वे अपनी ही पार्टी के किए धरे पर पलीता लगाने पर लगे हैं। उल्लेखनीय है कि मेजर जनरल भुवन चंद खण्डूडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश का परिणाम पांचों लोकसभा सीट पर पार्टी को मिली करारी शिकस्त के रूप में प्रदेश की जनता दे चुकी थी और प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल भाजपा आलाकमान भी भांप चुका था। यही कारण है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी से खण्डूडी को हटाया गया और ताजपोशी की गई एक युवा नेता निशंक की। कुछ दिन तो भाजपा के वे नेता मुख्यमंत्री के सुर में सुर मिलाते रहे लेकिन बाद में इन नेताओं को लगने लगा कि यदि निशंक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी पकड़ मजबूत कर दिए तो इनका राजनैतिक भविष्य चौपट हो जाएगा। सो ये नेता अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की कुर्सी के पायों को खींचने पर लग गए। इन्हें निशंक के हर कार्य बुरे लगने लगे और विपक्ष तो कम भाजपा के ये नेता निशंक के खिलाफ प्रदेश से लेकर केंद्र तक माहौल बनाने में जुट गए। लेकिन निशंक के कार्याें ने केंद्रीय आलाकमान को जहां संतुष्ट किया वहीं निशंक के कार्यों से प्रदेश की जनता में भी भाजपा के पक्ष में कम होता जनाधार भी बढ़ता गया। आज स्थिति खण्डूडी के शासनकाल से उलट है। प्रदेश में मुख्यमंत्री के ताबडतोड़ दौरों ने भाजपा के जनाधार में अप्रत्याशित वृद्धि की हैै। यह वृद्धि अचानक ऐसे ही नहीं हुई इसके पीछे डा. निशंक की कुशल कार्य क्षमता और जनता में उनकी पैठ प्रमुख रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि डा. निशंक ने 20 फरवरी के बाद प्रदेश में भाजपा के पक्ष में वह माहौल खडा कर दिया है जो कोई नेता नहीं कर सकता। प्रदेश का मुखिया राज्य बनने के बाद ऐसे-ऐसे दूर-दराज के गांवों तक पहुंचा जहां वर्तमान उत्तराखण्ड के नेता तो क्या आजादी के बाद से बने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश के नेता तक नहीं पहुंचे थे। मुख्यमंत्री निशंक ने इन दूर-दराज के गांवों के लोगों की सुध ही नहीं ली बल्कि उनकी समस्याओं को आत्मसात भी किया और दौरे से लौटने के बाद देहरादून पहुंचने पर ग्रामीणों द्वारा दिए गए पत्रों पर शासन को तुरंत कार्यवाही के निर्देश भी दिए। इससे ग्रामीणों में भाजपा सरकार के प्रति अपनापन तो पैदा हुआ ही साथ ही ग्रामीणों को यह लगने लगा है कि भाजपा सरकार उनकी खैरख्वाह है। प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक वातावरण को यदि देखा जाए तो भाजपा के ही नेता अपनी ही सरकार के कार्यों से संतुष्ट नहीं है और वे मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा माहौल खड़ा करने की कोशिश में लगे हुए हैं जिससे पार्टी को खासी हानि उठानी पड़ सकती है। विपक्ष तो सत्ता के कार्याें को कभी भी जायत नहीं ठहराता यहां तो सत्ता पक्ष ही विपक्ष बना हुआ है।

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नेपथ्य की ओर जा रहे दल में जान फूंकने की कवायद

राजेन्द्र जोशी

उत्तराखण्ड क्रंाति दल आजकल राजनीतिक गतिविधियो के चलते सुर्खियो मे है। दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पवंार जहा एक ओर अनुशासन का डंडा चलाते हुए नैपथ्य की ओर जा रहे दल को उत्तराखण्ड की राजनीति की मुख्य धारा मे लाने के लिए प्रयासरत है तो वही दूसरी ओर सत्ता की मलाई चाट रहे कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट है कि पार्टी से निकाल बाहर किए जाने के बाद भी यू.के.डी को तोडने पर जुटे है।
यहंा यह भी उल्लेखनीय है कि पहले काग्रेंस और अब भाजपा के साथ पींगे बढाने वाली यू.के.डी को चुनाव के नजदीक आते ही अपने अस्तित्व की याद आने लगती है। दल के नेताओ को सत्ता के साथ मलाई चटकाने की आदत पड चुकी है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव से ऐन पहले यह दल सत्ता से विमुख होकर अपनी ढपली अलग ही बजाना शुरू कर देते है। और चुनाव के बाद दो चार सीटे लाने पर यह राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के हमराही बन जाते है। वही दूसरी ओर यू.के.डी को राज्य आंदोलनकारी दल के रूप मे प्रदेश भर मे राज्य बनने के बाद अपार जन समर्थन मिला था। लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के साथ गलबहिया करते हुए यह दल राज्यवासियो के जेहन मे वह मुकाम नही बना पाई जिसकी कि  राज्यवासियो ने कल्पना की थी। क्षेत्रीय दल होने के कारण राज्यवासियो ने इस दल के प्रति अपनापन तो था ही साथ ही इस दल से यह उम्मीद भी थी कि यह दल राज्यवासियो के राज्य निर्माण के उदेदश्य को पूरा करेगा। लेकिन यह दल राज्यवासियो के मंसूबो पर खरा तो नही उतर पाया लेकिन इसके नेता जरूर अपने मंसूबो को मुकाम तक पहुचाने मे कामयाब रहे। इसका यह परिणाम हुआ कि राज्य निर्माण के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव मे इस दल को चार सीटे मिली थी और इसके  बाद हुए 2007 के चुनाव मे यह तीन सीटो पर आकर सिमट गई।
दल के अध्यक्ष बनने के बाद त्रिवेन्द्र पंवार ने दल को शक्ति के रूप् मे स्थापित करने के उदेदश्य से भाजपा सरकार से समर्थन वापस लेकर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की शुरूआत की। इसी क्रम मे उन्होने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करते हुए दल के सभी नेताओ से इस्तीफा देने की गुजारिश की। लेकिन सत्ता की मलाई चाट रहे चंद नेताओ को उनका यह फैसला रास नही आया और वे दल से बगावत कर गए। इस बगावत का यह परिणाम हुआ कि संगठन ने कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट को तो निष्कासित कर दिया और 12 अन्य भट्ट के हमराहियो को तीन दिन मे जवाब देने को कहा गया है कि वे अपना स्पष्टिकरण पार्टी को दे कि वे क्यों भट्ट के साथ राजभवन गए।
नेपथ्य की ओर जा रहे दल में जान फूंकने की कवायद
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 5 जनवरी। उत्तराखण्ड क्रंाति दल आजकल राजनीतिक गतिविधियो के चलते सुर्खियो मे है। दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पवंार जहा एक ओर अनुशासन का डंडा चलाते हुए नैपथ्य की ओर जा रहे दल को उत्तराखण्ड की राजनीति की मुख्य धारा मे लाने के लिए प्रयासरत है तो वही दूसरी ओर सत्ता की मलाई चाट रहे कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट है कि पार्टी से निकाल बाहर किए जाने के बाद भी यू.के.डी को तोडने पर जुटे है।
यहंा यह भी उल्लेखनीय है कि पहले काग्रेंस और अब भाजपा के साथ पींगे बढाने वाली यू.के.डी को चुनाव के नजदीक आते ही अपने अस्तित्व की याद आने लगती है। दल के नेताओ को सत्ता के साथ मलाई चटकाने की आदत पड चुकी है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव से ऐन पहले यह दल सत्ता से विमुख होकर अपनी ढपली अलग ही बजाना शुरू कर देते है। और चुनाव के बाद दो चार सीटे लाने पर यह राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के हमराही बन जाते है। वही दूसरी ओर यू.के.डी को राज्य आंदोलनकारी दल के रूप मे प्रदेश भर मे राज्य बनने के बाद अपार जन समर्थन मिला था। लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के साथ गलबहिया करते हुए यह दल राज्यवासियो के जेहन मे वह मुकाम नही बना पाई जिसकी कि  राज्यवासियो ने कल्पना की थी। क्षेत्रीय दल होने के कारण राज्यवासियो ने इस दल के प्रति अपनापन तो था ही साथ ही इस दल से यह उम्मीद भी थी कि यह दल राज्यवासियो के राज्य निर्माण के उदेदश्य को पूरा करेगा। लेकिन यह दल राज्यवासियो के मंसूबो पर खरा तो नही उतर पाया लेकिन इसके नेता जरूर अपने मंसूबो को मुकाम तक पहुचाने मे कामयाब रहे। इसका यह परिणाम हुआ कि राज्य निर्माण के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव मे इस दल को चार सीटे मिली थी और इसके  बाद हुए 2007 के चुनाव मे यह तीन सीटो पर आकर सिमट गई।
दल के अध्यक्ष बनने के बाद त्रिवेन्द्र पंवार ने दल को शक्ति के रूप् मे स्थापित करने के उदेदश्य से भाजपा सरकार से समर्थन वापस लेकर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की शुरूआत की। इसी क्रम मे उन्होने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करते हुए दल के सभी नेताओ से इस्तीफा देने की गुजारिश की। लेकिन सत्ता की मलाई चाट रहे चंद नेताओ को उनका यह फैसला रास नही आया और वे दल से बगावत कर गए। इस बगावत का यह परिणाम हुआ कि संगठन ने कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट को तो निष्कासित कर दिया और 12 अन्य भट्ट के हमराहियो को तीन दिन मे जवाब देने को कहा गया है कि वे अपना स्पष्टिकरण पार्टी को दे कि वे क्यों भट्ट के साथ राजभवन गए।

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2010 में निशंक सरकार ने कई आयामों को तो छुआ, लेकिन कई आरोपों को भी झेला

राजेन्द्र जोशी

देहरादून । मुख्यमंत्री निशंक की ताजपोशी के बाद विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भी नवोदित राज्य उत्तराखण्ड आज तक राज्य ने विकास के कई नये आयाम तो छुये ही हैं साथ ही प्रदेश ने संस्कृति व सास्ंकृतिक क्षेत्र में नये सोपानों को जोड़ा है। वहीं इस बीते साल में मुख्यमंत्री निशक को कई आरोपों में भी लपेटा गया, जिसमें उनकी कहीं भी सहभागिता नहीं पायी गयी, वहीं उच्चन्यायालय ने भी इस बात को माना कि सरकार में शामिल अधिकारियों ने सरकार को गुमराह कर सरकार से गलत कार्या करवाये।जबकि मुख्यमंत्री ने इन मामलों के संज्ञान में आते ही इन्हे तुरन्त निरस्त तक कर दिया। मसलन जलविद्युत परियोजनाओं के आंवंटन का मामला हो अथवा ऋषिकेश के चर्चित स्टर्डिया फैक्ट्री का मामला दोनों ही मामलो ंमें हो हल्ला मचाने वाली कांग्रेस को तो मंुह की खानी ही पड़ी वहीं पार्टी में ही उनके विरोधियों को न्यायालय के निर्णय ने चित्त कर डाला। कुल मिलाकर बीता वर्ष 2010 निशंक की विकास गाथा लिख गया। पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन के समय सेे अब तक प्रदेश ने अवस्थापना एवं सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। नवोदित राज्यों में तो उत्तराखण्ड शीर्षस्थ है ही, राष्ट्रीय स्तर के विकास सूचकांक में भी उत्तराखण्ड कई क्षेत्रों में अग्रणी बताया गया है 10 साल के इस नवोदित राज्य ने अपने 65 प्रतिशत वन और दुरूह भौगोलिकता के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक विकास दर में देश में तीसरा शीर्षस्थ राज्य होने का गौरव भी इसी साल हासिल किया है। प्रदेश की विकास दर राज्य बनने के समय 2.9 प्रतिशत थी। विकास दर में 3 गुना से अधिक वृद्धि करते हुए प्रदेश ने 9.5 प्रतिशत वृद्धि दर भी निशंक शासन काल में हासिल की है। वहीं आम आदमी का जीवन स्तर ऊंचा उठाने और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से संचालित करने के फलस्वरूप राज्य ने बीस सूत्री कार्यक्रम में देश में प्रथम स्थान हासिल किया है। पर्यटन में देश में अव्वल रहते हुए राज्य को केन्द्रीय योजना आयोग के अध्ययन के अनुसार घरेलू पर्यटकों की संख्या की दृष्टि से हिमालयी राज्यों में उत्तराखण्ड प्रथम स्थान पर तथा देश के समस्त राज्यों में सातवें स्थान पर रखा है। उत्तराखण्ड पूरे देश व दुनिया को प्राण वायु देता है साथ ही प्रदेश का 64 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र है। राज्य सरकार ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस कार्य किए हैं, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर योजना आयोग द्वारा भी सराहा गया है और योजना आयोग द्वारा अपने सर्वेक्षण में देश में बेहतर पर्यावरण संरक्षण के लिए उत्तराखण्ड को प्रथम स्थान पर रखा गया है। वहीं 108 सेवा को राज्य महिला आयोग, पुलिस सहायता और वन विभाग से जोड़ा गया। केन्द्रीय योजना आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार बैंकिंग सुविधा देने में राज्य में प्रति लाख जनसंख्या पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक शाखाओं का औसत 7.71 का है जो राष्ट्रीय औसत 4.51 की तुलना में काफी अधिक है। ग्रामीण विद्युतीकरण की दिशा में 96 प्रतिशत से अधिक ग्राम विद्युतीकृत किये जा चुके हैं, जो राष्ट्रीय औसत 82 प्रतिशत से बहुत अधिक है। राज्य सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में प्रभावी पहल की है। सरकार के इन प्रयासों की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना की गई है। रजिस्ट्रार जनरल, भारत सरकार द्वारा 2009 में कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखण्ड में जन्मदर 20.1 प्रति हजार है, जो राष्ट्रीय औसत 22.8 से कम है। इसी प्रकार मृत्युदर 6.4 प्रति हजार है, जो राष्ट्रीय औसत 7.4 से कम है। शिशु मृत्युदर 44 प्रति हजार है, जो कि राष्ट्रीय औसत 53 प्रति हजार की तुलना में काफी कम है। जहां एक ओर आज भी देश के कई प्रदेश बिजली की मार झेल रहे हैं वहीं उत्तराखण्ड ने बिजली की मांग के सापेक्ष आपूर्ति के लिए 7841 मिलियन यूनिट लक्ष्य के सापेक्ष 7765 मिलियन यूनिट की उपलब्धि हासिल करते हुए पूरे देश में राज्य ने दूसरा स्थान प्राप्त किया है।इतना ही नहीं गांव-गांव तक बिजली पहंुचाने के राज्य सरकार के संकल्प के तहत निर्धारित 47 गांव के लक्ष्य के सापेक्ष प्रदेश ने 65 गांव का विद्युतीकरण कर 138 प्रतिशत कार्य करते हुए पूरे देश में राज्य नें दूसरा स्थान प्राप्त किया है। वहीं राज्य सरकार ने वित्तीय नियोजन का परिचय देते हुए केन्द्रीय योजना आयोग से उत्तराखण्ड राज्य के लिए लगातार बढ़ी हुई वार्षिक योजना स्वीकृत कराने में सफलता प्राप्त की है। जहां वर्ष 2001-02 में योजना का आकार रूपये 1050 करोड़ था। वहीं वित्तीय वर्ष 2010-11 में बढ़कर रूपये 6800 करोड़ हो गया है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में राज्य को 360 करोड़ रूपये की अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता भी मिली है। प्रदेश सरकार के वित्तीय प्रबन्धन से प्रभावित होकर 13वें वित्त आयोग से वर्ष 2010 में 1000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रोत्साहन के रूप में मंजूर की गई है। राज्य गठन के समय लगभग 15 हजार रूपये प्रति व्यक्ति वार्षिक आय थी, जो वर्तमान में बढ़कर लगभग 42 हजार रूपये प्रति व्यक्ति हो गई है। राज्य सरकार ने अपने सीमित संसाधनों का उपयोग करते हुए आय के साधन बढ़ाए हैं। ऐसी विकासपरक योजनाएं शुरु की हैं, जिनसे रोजगार के अधिक अवसर मिल सके। इससे साबित होता है कि प्रदेश सरकार रोजगार व स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर प्रदेशवासियों की आमदनी में वृद्धि करने में सफल रही है। अपनी आय बढाने में भी राज्य के गठन बाद इन दस वर्षों में अपने राजस्व में अभूतपूर्व वृद्धि की है। राज्य गठन के समय जहां राजस्व प्राप्ति लगभग 200 करोड़ रूपये थी, वह आज बढ़कर 13342.45 करोड़ रूपये हो गई है। राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य मार्ग, मुख्य जिला मार्ग, ग्रामीण मोटर मार्ग, ग्रामीण हल्का वाहन मार्ग सहित वर्ष 2001-02 में कुल 982 किलोमीटर सडकें निर्मित थी। दस वर्षों में 21886 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया। सड़कों के लिए वर्ष 2001-02 में 170.16 करोड़ रूपये धनराशि का बजट स्वीकृत था, जबकि वर्ष 2010-11 तक 442.76 करोड़ रूपये की व्यवस्था की गई है। एक जानकारी के अनुसार वर्ष 2001-02 में कुल 84 पुल थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 742 हो गई है। अब तक सड़कों के निर्माण पर 5873.86 करोड़ रूपये धनराशि व्यय की गई है। उत्तराखण्ड में प्रचुर मात्रा में जड़ी-बूटियां, सगंध पादप, फलदार वृक्ष हैं। जिनके बेहतर दोहन से बेमौसमी सब्जी, फल, फूल आदि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि की गई है। जड़ी-बूटी की खेती के लिए इसकी लागत मूल्य का 50 प्रतिशत, अधिकतम एक लाख रूपये भौगोलिक जलवायु व जैविक विविधता वाले इस हिमालयी राज्य में विभिन्न फल, सब्जी, पुष्प व मसाला फसलों की और भी संभावनाएं तलाशी जा रही है। इतना ही नहीं जड़ी-बूटी को आमदनी का मजबूत जरिया बनाने के लिए ‘बागवानी विकास परिषद’ का गठन तक किया गया है राज्य सरकार ऊर्जा के क्षेत्र में राज्य को आत्म निर्भर बनाने के लिए प्रदेश सरकार ने जहंा वर्ष 2001-02 में 997 मेगावाट जल विद्युत उत्पादन बढ़कर वर्ष 2010-11 में 3100 मेगावाट कर दिया है। वहीं 35 सालों से लम्बित बहुउद्देशीय जमरानी बांध परियोजना ,लखवाड़-व्यासी जल विद्युत परियोजना पर भी कार्य शुरू किया जा चुका है। जबकि हिमाचल प्रदेश के सहयोग से किशाऊ बांध परियोजना के लिए प्रभावी पहल की गयी है। राज्य गठन के समय जहां 12563 (79ः) गांवों में बिजली थी, वहीं वर्ष 2010-11 में यह बढ़कर 15545 (98.6ः) गांवों तक पहुंच गई है। इसी तरह 16667 ऊर्जीकृत टयूबवेल/पम्पसेट अब वर्ष 2010-11 में बढ़कर 22277 हो गये हैं। लाइन लॉस में भी उल्लेखनीय कमी आई है। यह पूर्व में 53 प्रतिशत से घटकर अब 29 प्रतिशत रह गई है। राज्य गठन के समय 7240 ग्रामीण पेयजल योजनाएं, 112 नलकूप, 10282 हैण्डपम्प, 63 नगरीय पेयजल तथा 44 पम्पिंग योजनाएं थी। इन दस वर्षों में 1547 ग्रामीण पेयजल योजनाओं का कार्य पूर्ण तथा 23 ग्रामीण पेयजल योजनाओं का कार्य प्रगति पर है। इसी प्रकार 307 नलकूप, 104 मिनी नलकूप का निर्माण तथा अभावग्रस्त क्षेत्र में 10694 हैण्डपम्प स्थापित किये गए।पेयजल योजनाओं के लिए तब 96.57 करोड़ रूपये की धनराशि थी, जो वर्ष 2010-11 में बढ़कर 421.58 करोड़ रूपये हो गई है। राज्य गठन के समय औद्योगिक प्रगति दर 1.9 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 26 प्रतिशत हो गयी है। राज्य गठन के समय पंूजी निवेश 95 करोड़ रूपये था, जो अब बढ़कर 26,000 करोड़ रूपये पूंजी निवेश किया है । पंतनगर, हरिद्वार, सितारगंज एवं सेलार्कुइं में कई औद्योगिक आस्थान स्थापित किये गये हैं। राज्य गठन के समय 4202 लोगों को रोजगार के अवसर। इन दस वर्षों में लगभग 91443 लोगो को रोजगार के अवसर मिले हैं। उत्तराखण्ड राज्य में इन दस वर्षों में क्रांतिकारी बदलाव आया है। दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों की तैनाती की गई है। जीवनदायिनी 108 आपात सेवा शुरू हुई है। श्रीनगर बेस चिकित्सालय को मेडिकल कालेज बनाया गया है। हल्द्वानी फॉरेस्ट ट्रस्ट मेडिकल कॉलेज का राजकीकरण कर दिया गया है। अल्मोड़ा तथा देहरादून में भी मेडिकल कॉलेज प्रस्तावित हैं। राज्य गठन के समय 1525 उपकेन्द्र, 23 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 235 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र थे। अब बढ़कर 1847 उपकेन्द्र, 55 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 255 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हो गये है। प्रदेश का पहला बी.एससी. नर्सिंग कालेज भी देहरादून में शुरू हो गया है। पौड़ी, अल्मोड़ा, टिहरी तथा पिथौरागढ़ में भी नर्सिंंग कालेज की स्थापना की कार्यवाही चल रही है। उत्तराखण्ड का 64 प्रतिशत भू भाग वनाच्छादित है। इनमें विभिन्न राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव विहार हैं। राज्य गठन के बाद प्रदेश में सघन वृक्षारोपण करकेे हरित आवरण में वृद्धि की गई है। वृक्षारोपण में औषधीय व सगंध पादपों पर भी जोर दिया गया है। नक्षत्र व बद्रीश वन वाटिका की प्रभावी पहल की गई है। राज्य गठन के समय 6839 वन पंचायतें गठित थी, जो आज बढ़कर 12079 हो गई हैं। वर्ष 2000-01 में राष्ट्रीय पार्कों एवं वन्य जीव विहार में लगभग 67776 की तुलना में 2008-09 में लगभग 2 लाख 92 हजार 990 व्यक्ति भ्रमण के लिए आये हैं, जिनकी संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। राज्य सरकार के प्रयासों से कैम्पा योजना के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिए 830 करोड़ रुपये स्वीकृत। वहीं बाघों के संरक्षण के लिए राज्य सरकार द्वारा बाघ संरक्षण का कार्यक्रम शुरु किया गया, जिसके लिए देश के प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धोनी को ब्रांड एम्बेसडर नामित किया गया। राज्य सरकार ने हवाई सेवा से जोड़ा पर्यटन स्थलों को। हैली टूरिज्म को प्रोत्साहित किया गया। राज्य गठन के समय पर्यटन अवस्थापना सुविधाओं के लिए मात्र 34.76 करोड रूपये धनराशि की व्यवस्था थी। वर्ष 2010-11 में यह धनराशि बढ़कर 111.23 करोड़ रूपये हो गई है। राज्य बनने पर जहां देशी पर्यटकों की संख्या एक करोड़ 05 लाख थी, वहीं यह संख्या बढ़कर अब तक 2 करोड़ 31 लाख हो गई है। राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में शुरू की गई वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना में तब मात्र 62 उद्यमियों को लाभान्वित किया गया था, जिनकी संख्या अब बढ़कर 3147 हो गई है।वर्ष 2001-02 में जहां विदेशी पर्यटकों की संख्या 55 हजार थी, वहीं यह संख्या बढ़कर अब तक एक लाख़ 18 हजार हो गई है। पहली बार लगभग 21 हजार नौकरियों के द्वार वर्ष 2010 में स्थानीय बेरोजगारों के लिए खोले गये हैं, जिनमें 12 हजार समूह ‘ग’, 4 हजार शिक्षक तथा 490 विभिन्न औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में अनुदेशक के पद शामिल हैं। उत्तर प्रदेश से आने वाले 4 हजार पुलिस कर्मियों के स्थान पर स्थानीय चार हजार नौजवानों की भर्ती की जायेगी। राज्य सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लाखों की संख्या में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार-स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। वहीं स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार के बेहतर अवसर प्रदान करने के लिए विभिन्न विभागों में होने वाली समूह ‘ग’ की भर्ती के लिए अब राज्य के सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण अनिवार्य। समूह ‘ग’ के कई पद लोक सेवा आयोग की परिधि से बाहर। चयन प्रक्रिया में मुख्यतः उत्तराखण्ड की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक परिवेश से सम्बन्धित जानकारी की अनिवार्य की गयी है।हालांकि समूह ग की परीक्षा में गढवाली, कुमायूंनी तथा जौनसारी बोलियों के ज्ञान को हटाने से सरकार का विरोघ भी हुआ है। राज्य गठन के समय 2104 नहरें निर्मित थी, जो इन दस वर्षों में बढ़कर 2490 हो गई हैं। राज्य गठन से अब तब लघु सिंचाई में 12537.22 किलोमीटर सिंचाई गूल, 8909 सिंचाई हौज, 510 हाईड्रम निर्मित करते हुए जिससे 1,23,368 हेक्टेयर सिंचन क्षमता का सृजन हुआ है। वर्ष 2010 में प्रारम्भ इस योजना के अन्तर्गत प्रदेश के सभी राजकीय कर्मचारियों तथा अवकाश प्राप्त कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति की सुविधा निजी क्षेत्र की सहभागिता से क्रियान्वित की जायेगी। चयनित संस्था द्वारा राज्य के अन्दर एवं अन्य राज्यों में सरकारी/गैर सरकारी चिकित्सालयों को चिन्हित किया जायेगा, जिनमें राज्य कर्मचारी स्मार्ट कार्ड के माध्यम से चिकित्सा सुविधा प्राप्त कर सकंेगे। सरकारी भर्तियों में किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोकने के लिए कारगर कदम उठाये गये हैं। पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई है। समूह ‘ग’ के पदों में साक्षात्कार की व्यवस्था को समाप्त किया गया है। अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षा में उत्तर शीट की कार्बन प्रति परीक्षा के पश्चात अपने साथ ले जाने की अनुमति भी दी गई है। नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए परीक्षा परिणाम को वेबसाइट पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है, ताकि परीक्षार्थी कार्बन कॉपी से अपने अंको का मिलान कर सकंे। कृषि योजनाओं का सीधा लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिये ‘कृषक महोत्सव’ शुरू किया गया है। राज्य सरकार द्वारा किसानों के लिए खाद, बीज, कृषि उपकरण आदि के क्रय पर 50 से 90 प्रतिशत छूट की योजनाएं चलाई गयी हैं। गांव-गांव कृषक रथ के जरिये किसानों की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। गांवों के समग्र विकास को प्रतिबद्ध राज्य सरकार ने इस दिशा में नायाब पहल करते हुए यह अभिनव ‘अटल आदर्श ग्राम योजना’ शुरू की है। यह योजना राज्य स्थापना दिवस 9 नवम्बर, 2009 से शुरू की गई। इसके लिए 670 न्याय पंचायत मुख्यालय के ग्रामों को प्रथम चरण में चुना गया है। इस योजना में 16 विभागों को शामिल किया गया है और प्रत्येक विभाग को निर्धारित लक्ष्य दिये गये हैं। इन सभी विभागों के द्वारा ग्राम स्तर पर समस्त अवस्थापना सुविधाएं, मसलन बिजली, पानी, चिकित्सा स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल आदि मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेगी। जिन्हें इस वित्तीय वर्ष के अंत तक पूरा कर लिया जायेगा। उत्तराखण्ड में महिलाओं की अहम भूमिका है। राज्य आन्दोलन में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभायी। राज्य सरकार ने पहली बार महिलाओं को सम्मान देते हुए पंचायत स्तर पर उन्हें 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की है। समाज की बालिकाओं की स्थिति में समानता लाने, कन्या भ्रूण हत्या रोकने तथा बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन हेतु बी.पी.एल. परिवारों को जन्म के उपरान्त बालिका के पक्ष में 5000 रुपये की धनराशि जमा करने की व्यवस्था की गयी है। सरकार ने बी.पी.एल. परिवार की इंटरमीडिएट उत्तीर्ण बालिकाओं को 25 हजार रुपये की एफ.डी. देने का निर्णय लिया गया है। इससे बालिकाओं को उच्च शिक्षा में मदद मिलेगी। उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य है, जिसनें अपने पूर्व सैनिकों का अभूतपूर्व सम्मान दिया है। उत्तराखण्ड देश का ऐसा विशिष्ट राज्य है, जहां लगभग प्रत्येक परिवार से कोई न कोई सदस्य सेना में है। सैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों तथा उनके परिजनों को पूर्ण सम्मान प्रदान करने के उद्देश्य से अनूठी पहल शुरू की गई है। ‘जय जवान आवास योजना’ भी शुरू। इसके तहत बनने वाले आवास के लिए निःशुल्क भूमि देने का निर्णय लिया गया है, जो देश में एक अनूठी पहल है। पर्यावरण संरक्षण में भूतपूर्व सैनिकों की सहभागिता सुनिश्चित करने एवं उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने के लिये राज्य में चार इको टॉस्क फोर्स का गठन किया गया। कुल मिलाकर 2010 निशंक सरकार के लिए कई खट्टे मीठे अनुभव दे गया, साथ ही उन्हे यह शिक्षा भी दे गया कि जो भी कार्य वे करें अपनी दिल दिमाग से करें और अपने विश्वसनीय लोगों की राय पर न कि पार्टी व अपने इर्द गिर्द घूम रहे उन चाटुकारों के कहने पर जो केवल कुर्सी पर रहते हुए ही उनके साथ दिखायी दे रहे हैं।

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स्टर्डिया मामले में सरकार को क्लीन चिट

अधिकारियों पर सरकार को गुमराह करने का आरोप
डीएम ले सकते हैं विवादित भूमि को अपने कब्जे में
राजेन्द्र जोशी
देहरादून ।  उत्तराखण्ड में बहुचर्चित स्टर्डिया मामले का आज अंततः पटाक्षेप हो ही गया हाईकोर्ट नैनीताल ने मुख्यमंत्री निशंक को क्लीन चिट देते हुए मामले से जुड़े प्रदेश के आला अधिकारियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्होने सरकार को इस मामले में गलत जानकारी तो दी ही साथ ही सरकार को गुमराह भी किया। इतना ही नहीं उच्चन्यायालय ने मामले में प्रदेश सरकार को निर्देश भी दिये  िकवह जिलाधिकारी को निर्देश दे कि वह उक्त भूमि को अपने कब्जे में ले ले, और मामले की उच्चस्तरीय जांच यदि कराना चाहे तो कर सकती है। मामले में उच्चन्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के बाद मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के निशाने पर रही भाजपा ने राहत महसूस की है वहीं भाजपा के एक गुट को भी इस निर्णय के आने के बाद तगड़ा झटका लगा है।
उल्लेखनीय है किं स्टर्डिया केमिकल की अरबों की भूमि को औने पौने दामों पर हडपने की साजिश रची गयी थी। इस भूमि को हड़पने के लिए बीमार इकाइयों को पुर्नजीवित करने के लिए गठित बोर्ड (बीआइएफआर) के समक्ष अरबों की भूमि को मात्र 13 करोड़ में बेच कर उद्योग को पुर्नजीवित करने की साजिश रच डाली। जिस कम्पनी ने बीआइएफ आर के समक्ष इकाई को जीवित करने का प्रस्ताव रखा था उसमें भाजपा के उत्तराखण्ड के सह प्रभारी अनिल जैन की धर्मपत्नी वन्दना जैन व अंगूरी देवी जिन्दल तथा दिनेश गुप्ता निदेशक थे, इस कम्पनी का नाम देववर्षा जेट्रोफा वैली प्राईवेट लिमिटेड था। चर्चा है कि मामला खुल जाने के डर से प्रदेश सह प्रभारी ने इसके बाद अपने ही परिजनों तथा मित्रों के नाम से एक और नयी कम्पनी बना डाली जिसका नाम स्टर्डिया डेवलेपर्स प्रा लि रखा गया जिसमें देववर्षा के निदेशक दिनेश गुप्ता ने अपनी धर्मपत्नी कुसुम गुप्ता के साथ अंगूरी देवी जिन्दल के नागपुर निवासी रिश्तेदार राहुल अग्रवाल को निदेशक बना डाला। चर्चा तो यहां तक है कि राहुल अग्रवाल संघ मुख्यालय नागपुर में किसी संघ अधिकारी के नजदीकी रिश्तेदार हैं। जहां तक तीसरे निदेशक श्यामसुन्दर की बात की जाये तो सवाल यह उठता है कि मामूली से एक कमरे के फ्लेट में रहने वाला श्यामसुन्दर करोड़ों की कम्पनी में कैसे निदेशक बना दिया था।
इस कम्पनी को बनाने के बाद भाजपा के सह प्रभारी इस जमीन को औने-पौने दामों पर लेने में कामयाब भी हो गये इतना ही नहीं इन्होने प्रदेश में भाजपा सरकार होने का जमकर फायदा उठाते हुए औद्योगिक स्वरूप की इस भूमि को बिना भू परिवर्तन शुल्क अदा किये, जोकि लगभग सवा अरब रूपये यानी 125 करोड़ रूपये बैठती है। कब्जा दी। इतना ही नहीं प्रदेश सरकार के आला अधिकारियों ने इस जमीन को देने के लिए एक ही दिन में सचिवालय के सेक्सन आफिसर से लेकर जिलाधिकारी व मुख्यसचिव तक के 26 अधिकारियों से हस्ताक्षर कराकर स्वीकृति ले ली।
मामले में बार बार चर्चा के केन्द्र रहे विजय जिन्दल जोकि पेशे से चार्टड एकाउन्टेन्ट हैं चर्चा है कि बीजेपी व संघ के कई बड़े नेताओं के करीबी हैं। इतना ही नहीं वे भाजपा के केन्द्रीय कमेटी के आय व्यय का हिसाब किताब भी रखते हैं।  इस सारी कहानी में कहीं न कहीं आपको भाजपा सह प्रभारी व भाजपा के कुछ आला नेताओं की भूमिका ही हर जगह नजर आती होगी। लेकिन यह सब तो पर्दे के पीछे का खेल था लेकिन न्यायालय द्वारा दिये गये इस फैसले से सरकार की छवि पर लगने वाले सवालों  विराम लग गया है। साथ ही न्यायायालय ने सरकार को जो जांच के आदेश दिये हैं उनसे तो कम से कम यह लगता है कि न्यायालय ने सरकार पर विश्वास जताया है।
वहीं दूसरी ओर प्रदेश मीडिया सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष अजेन्द्र अजय अनिल डब्बू सहित भाजपा प्रदेश सहप्रवक्ता सतीश लखेड़ा ने सिटुर्जिया बायोकैमिकल्स फैक्ट्री प्रकरण में नैनीताल उच्चन्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के संबंध में कहा कि निर्णय से वर्तमान सरकार व मुख्यमंत्री को क्लीनचिट मिली है और भू-उपयोग संबंधी आदेश को रद्द करने के वर्तमान सरकार के निर्णय पर मुहर लगने के साथ विरोधियों द्वारा लगाये जा रहे आरोप राजनीति से प्रेरित व गलत सिद्ध हुए हैं।
आज यहां जारी एक बयान में भाजपा नेताओं ने कहा कि माननीय उच्चन्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के अनुसार उत्तराखण्ड में कांग्रेस शासन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी द्वारा 24 फरवरी 2007 को लिये गये निर्णय के आधार पर की गयी समस्त कार्यवाही को निरस्त कर दिया गया है। उस समय मुख्यमंत्री द्वारा अपने आदेश में लिखा गया था कि बी.आई.एफ.आर. का आदेश बाध्यकारी हैं। और इसी के आधार पर बाद की सरकार द्वारा कार्यवाही की गई थी। उच्चन्यायालय के निर्णय से सारी स्थिति स्वयं स्पष्ट हो जाती है।
उन्होंने कहा कि न्यायालय के निर्णय से वर्तमान सरकार द्वारा लिये गये उस फैसले पर मुहर लगी है जिसके द्वारा सरकार ने फैक्ट्री भूमि के भू-उपयोग  संबंधी आदेश को रद्द कर दिया था। न्यायालय के निर्णय से वर्तमान सरकार व मुख्यमंत्री दोनों को क्लीनचिट मिली है और इससे यह भी सिद्ध हुआ है कि विरोधियों द्वारा लगाये जा रहे आरोप मात्र राजनीतिक द्वेष से प्रेरित थे और ये आरोप पूर्ण रूप से गलत सिद्ध हुए हैं। भाजपा नेताओं ने कहा कि न्यायालय ने भूमि के संबंध में जो व्यवस्था दी है उसके अनुसार भूमि का उपयोग फैक्ट्री कार्य के लिए ही किया जा सकेगा। इस मामले में सरकार अपने स्तर से जांच करा सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार उच्च न्यायालय  के निर्णय का पूर्ण सम्मान करती है। सरकार द्वारा निर्णय का समग्र अध्ययन करने के पश्चात आगे की कार्रवाई की जायेगी।

 

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शोषकों से जूझती पहाड़ी युवती

राजेन्द्र जोशी साथ में सुप्रिया रतूड़ी
पुष्पा की दास्तां गरीब घरों की उन भोली-भाली दर्जनों पहाड़ी लड़कियों की तरह ही है जो विवाह के नाम पर गरमगोश्त के सौदागरों के शिकंजे में फंस जाती हैं। किन्तु इस मामले में एक खास बात यह है कि पुष्पा ने जिस सूझ-बूझ एवं हिम्मत का परिचय दिया तथा ससुराल के नाम पर मिली नरक जैसी जिन्दगी से उबरकर शैतानों को उनके कुकर्मों की सजा दिलाने को हिम्मत बॉंधी है, वह बात नरक भोगती कम ही लड़कियों में दिखाई देती है। सदमे पर काफी हद तक काबू पा चुकी पुष्पा कहती है- ‘मैं अब उन लड़कियों कि लिए भी लडूंगी जो दबंगों एवं दलालों की बुरी नजरों की मार झेल रही हैं।’
आज से करीब ढाई वर्ष पूर्व, 13 अप्रैल 2008 को पुष्पा का विवाह धर्मपाल सिंह पुत्र भोंदूराम निवासी सुराना गांव, जिला गाजियाबाद से हुआ था। विवाह के वक्त वह 22 वर्षीय मासूम एवं 12वीं तक शिक्षित गांव की युवती थी। बेहद गरीब घर में पलते-बढ़ते हर वक्त गांव एवं इलाके के जमींदारांे और महाजनों की बुरी नीयत से प्रताड़ित पुष्पा के सामने पिता के पक्षाघात के शिकार होने के बाद माँ की मजबूर जिंदगी का डरावना अनुभव था। ऐसे में जब दूर एवं अनजान इलाके मंे ही सही उसे बेहतर जीवन की आस बंधी तो वह अपने ससुराल सुराना खुशी-खुशी चल दी। मगर पति के नाम पर इज्जत एवं सुरक्षित जिन्दगी देने का वचन देने वाले धर्मपाल ने खुद तो पत्नी को मनचाहे तरीके से रौंदना शुरू किया ही उपर से तीसरे दिन से ही ग्राहकों के सम्मुख नोचने को प्रस्तुत कर दिया। नव विवाहिता के सपनों का यह खून लगातार चलता रहा और पुष्पा के विरोध करने पर उसको जानवरों की तरह मारा-पीटा जाता। दिन भर नंगाकर घर मंे बंद कर दिया जाता था ताकि वह कहीं बाहर निकल कर ससुराल में हो रहे कुकर्म का भांडाफोड़ न कर दे। बुरी तरह टूट चुकी नवविवाहिता अपने पति की खुशामद कर किसी तरह अपने मायके उत्तरकाशी लौटने में कामयाब हो गयी।
कोली समुदाय के मदन सिंह का परिवार डुण्डा तहसील के मातली गांव में रहता है। पुष्पा घर की बड़ी बेटी है। विवाह के 4 माह बाद जब वह अपने मां एवं बहन के पास लौटी तो तन-मन से टूट चुकी  धियाण को देखकर सभी बहुत दुखी हुए। यहां यह बात भी जाननी जरूरी है कि पुष्पा का विवाह धर्मपाल से कराने में उत्तरकाशी की नारायणी देवी की भूमिका मध्यस्थ की थी। धर्मपाल उत्तरकाशी के  देवीधार में एक भण्डारे में काम करता था और उसके द्वारा विवाह की बात कहने पर नारायणी देवी ने पुष्पा को ब्याहने के लिए मंजूर करा लिया। बताया जाता है कि विवाह के लिए धर्मपाल ने एक मोटी रकम भी ससुराल पक्ष को दी। स्वाभाविक था कि लुटी-पिटी पुष्पा ने सारा हाल नारायणी देवी को भी बताया और धर्मपाल के विरूद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखाने की बात कही। पुष्पा द्वारा एस.एस.पी. उत्तरकाशी को 1 जून 2010 को दी गयी तहरीर मंे बताया गया है कि नारायणी देवी के यहां मौजूद धर्मपाल एवं नारायणी देवी ने पुष्पा को धमकाया और रिपोर्ट लिखवाने पर उसकी छोटी बहन के साथ भी यही अंजाम देने की बात कही। तहरीर मंे पुष्पा के एसपी कार्यालय में जाने पर उसको रिपोर्ट देने से रोकने के लिए जिस तरह के घटनाक्रम का उल्लेख है वह बयान करने के काबिल नहीं है। यहां तक कि इन हालातों के दबाव मंे पक्षाघात से पीड़ित मदन सिंह की मृत्यु हो गयी। सबसे ज्यादा शर्मनाक बात तो यह है कि पुष्पा की दुखभरी दास्तां को और गहरा करने में जिस तरह कांस्टेबल माया गुसांई का नाम आया है उससे महिला हैल्पलाइन उत्तरकाशी पर भी सवाल उठने लगे हैं।
चारों ओर से दबाव में घिरी पुष्पा ने अपने परिवार की सलामती के लिए भारतीय समाज की पत्नी की तरह अपमान एवं लहू का घूंट पीते हुए पति के घर लौटने का रास्ता चुना। किन्तु धर्मपाल में कोई बदलाव नहीं आया। यह क्रम तीन-चार बार चलने के बाद वर्ष 2009 के अंत में पुष्पा थक हार कर मायके मातली आ गयी किन्तु अपने इस अंजाम के जिम्मेदार लोगों को सजा दिलवाने की आग उसे बेचैन किए  रही। खुद की जान एवं परिवार की सुरक्षा की चिंता मंे घुलती हुई वह 27 मई 2010 को स्वयं सेवी संस्था ‘समाधान’ देहरादून पहंुची। यह अफसोस है कि कई बार कोशिश करने के बाद भी अभी तक पुष्पा की एफ.आइ.आर. दर्ज नहीं हुई है। उसके द्वारा 1जून 2010 को दी गई तहरीर के सम्बन्ध में उत्तरकाशी पुलिस ने इसी अगस्त को जो जाँच का निष्कर्ष दिया है वह बेहद गैर जिम्मेदाराना है। इस जांच में जहां एक ओर पुष्पा एवं उनकी माँ को धन्धा करने वाली उल्लेखित किया गया वहीं धर्मपाल एवं पुष्पा देवी दोनांे का व्यवहार ठीक नहीं होने के कारण उनके सम्बन्ध बिगड़ने की बात कही गयी है। जांच रिपोर्ट विवाह में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाली नारायणी देवी एवं कांस्टेबल माया गुसांई को भी बचाती है। गंभीर बात तो यह है कि उत्तरकाशी पुलिस का तर्क है कि क्योंकि पुष्पा की तहरीर के मुताबिक उसके साथ जो घटना हुई वह ससुराल में हुई है इसलिए इसके उपर कार्यवाही जिला गाजियाबाद में ही की जानी चाहिए। पीड़िता का कहना है कि जहां से वह जान बचाकर भागी है वहीं जाकर वह अपनी लड़ाई कैसे लड़ सकती है। इससे तो उन्हीं लोगों को फायदा होगा जिन्होंने उसके साथ भयानक साजिश रची। दरअसल उत्तरकाशी के पिछड़े क्षेत्रों से जिस तरह बार-बार वहां के गरीब घरों की लड़कियों के हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ब्याहे जाने की खबरंे आ रही हैं एवं उसके बाद कई मामलों मंे ब्याहताओं की नरकीय जिंदगी की बातें खुलीं हैं उससे गहरी साजिश की आशंका प्रबल होती है। यह गिरोह पुष्पा जैसी शोषित लड़कियों के न्याय पाने के रास्ते में बहुत बड़ी बाधा बना हुआ है। लेकिन जैसा कि मान्यता है कि पाप का घड़ा एक दिन फूट जाता है। शायद पुष्पा की हिम्मत ही यह शुरूआत कर दे!

पुष्पा की बहन सरस्वती कर कहना है कि पुलिस ने मेरे साथ हुये अत्याचार की अनदेखी की। यदि मेरी एफ0 आई0 आर0 लिखी गयी होती तो इन लोगों को प्रोत्साहन न मिला होता और न ही मेरी बहिन पुष्पा के साथ ये सब होता।
पुलिसिया है महिला पुलिस की सोच
गीता गैरोला निदेशक महिला  सामाख्या के अनुसार पुष्पा की रिपोर्ट उसके मायके उत्तरकाशी में दर्ज नहीं किया जाना बिल्कुल गलत है महिला अपने मायके से ज्यादा स्वयं को कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं कर सकती। राज्य में महिलासशक्तीकरण को बढावा देने पर जोर दिया जा रहा है तो क्या महिला सुरक्षा जरूरी नहीं है। इतने जघन्य अपराध के बाद एफ0 आई0 आर0 दर्ज न होना पुलिस के चरित्र को दर्शाता है। महिला पुलिस की सोच महिलाओं के प्रति संवेदनशील न होकर पुलिसिया है।
समाधान संस्था की संचालक व एडवोकेट रेणु डी सिंह का कहना है कि उस वक्त पुष्पा दिमागी तौर पर सामान्य नहीं थी, वह खासी कमजोर एवं बुरी तरह टूटी हुई थी। यह अफसोस है कि कई बार कोशिश करने के बाद भी अभी तक पुष्पा की एफ.आइ.आर. दर्ज नहीं हुई है।

 

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फेस बुक पर बोलियों की लड़ाई हुई फेस टू फेस

बोलियों की लड़ाई सोशलनेटवर्क तक जा पहुंची
फेस बुक पर बोलियों की लड़ाई हुई फेस टू फेस
राजेन्द्र जोशी

देहरादून । उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर राज्यवासियों ने केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर कर खुली जंग लड़ी लम्बी लड़ाई व कई शहादतों के बाद राज्य तो मिला लेकिन राज्यवासियों की लड़ाई अब भी जारी है। कभी रोजगार को लेकर तो कभी पलायन की समस्या को लेकर। जहां एक ओर सड़कों पर अपने हकों के लिए खुली जंग लड़ी गयी वहीं अब राज्य वासी व प्रवासी उत्तराखण्डी एक बार फिर अपने हकों के लिए सड़कों के बजाय संचार माध्यमों के जरिये लड़ाई लड़ रहे हैं। यह लड़ाई न तो पलायन की समस्या को लेकर है और न ही रोजगार व राजधानी के मसले पर है यह लड़ाई प्रदेश की तीन प्रमुख बोलियों गढ़वाली, कुंमाउंनी व जौनसारी, को लेकर हैं। दरअसल राज्य सरकार ने अपनी बोलियों के प्रति भलमानुषता दिखाते हुए समूह “ग” की प्रवेश परीक्षा में शामिल किये जाने को लेकर एक शासनादेश जारी किया लेकिन हमेशा की तरह मैदानी व पहाड़ीवाद की भेंट चढ़ गया। उल्लेखनीय है कि राज्य कैबिनेट में एक कैबिनेट मंत्री मदनकौशिक ने इसका विरोध किया और उसी सरकार ने राज्यवासियों की भावनाओं को दरकिनार कर दबंग कैबिनेट मंत्री के दबाव में अपने ही आदेश को वापस ले लिया। जिससे प्रदेश वासियों व अप्रवासियों के बीच इस आदेश की वापसी को लेकर अंसतोष के स्वर उभरने लगे हैं। जिसके संकेत बहुचर्चित सोशल नेटवर्क फेसबुक की दुनिया में देखने को मिलतें है।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए ही राज्य सरकार ने इन बोलियों को समूह “ग” की परीक्षा में शामिल किया था,क्योंकि समूह “ग” के अंतर्गत परीक्षा देने वाले परिक्षार्थी को उत्तराखण्ड में ही नौकरी करनी होती है इसलिए यह आवश्यक है कि उसे स्थानीय बोलियों की जानकारी तो कम से कम होनी ही चाहिए ताकि वह कम पढ़े लिखे ग्रामीणों की भाषा को अच्छी तरह से समझ  सके लेकिन सरकार के इस कदम से ग्रामीणों की उम्मीदों पर भी पानी फिरा है। हालांकि मुख्यमंत्री ने अभी इस पर विचार करने का आश्वासन प्रदेशवासियों को दिया है।
वहीं सोशलनेटवर्किंग साईट फेस बुक पर पत्रकार राजेन्द्र टोडरिया ने कहा है कि उत्तराखंड मंत्रिमंडल की बैठक में एक मदन कौशिक ने विरोध किया और उत्तराखंड सरकार ने गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी को समूह ग की परीक्षा से बेदखल कर दिया गया। मंत्रिमंडल की उस बैठक में मुख्यमंत्री समेत 11 गढ़वाली और कुमंाऊनी मंत्री भी थे और वे नपुंसकों की तरह चुपचाप बैठे रहे। उनमें एक दिवाकर भट्ट भी था जो खुद को उत्तराखंड के पहाड़ियों का ठेकेदार बताता रहा है। इन मंत्रियों के साथ कैसा सुलूक होना चाहिए,यह आपको और हमें तय करना है।
दिल्ली के पत्रकार वेद भदोला ने कहा कि यदि आप भी उत्तराखंड मंत्रिमंडल के इस फैसले से आहत हैं और अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं तो एक पोस्ट कार्ड भेज अपना  विरोध दर्ज कराने का कष्ट करें।उनका कहना है कि  दरअसल उत्तराखंड के क्षेत्रीय दल जिनमे उक्रांद भी है, आज तक जनता के सामने कोई ठोस राजनैतिक विकल्प प्रस्तुत ही नहीं कर पाया. एकमात्र कारण ये कि उक्रांद के पास भी कांग्रेस-भाजपा की तरह उत्तराखंड के लिए कोई विजन नहीं है।
सुभाष काण्डपाल का कहना है कि एक आन्दोलन उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए लड़ा गया था. अब तो मुझे लगता है कि एक और आन्दोलन लड़ने का समय आ गया है. विलुप्त होती हुई अपनी भाषा बोली, संस्कृति रीति रिवाज, लोक साहित्य और लोक कला संगीत के संवर्धन के लिए अपने ही जन प्रतिनिधियों से आवाज बुलंद करने का अब समय आ गया है. उत्तराखंड शुरू से ही पहाड़ी राज्य कहाँ रहा है. यहां का पहला मुख्यमंत्री ही गैर- पहाड़ी रहा. ऐसे में फिलहाल आदर्श पहाड़ी राज्य की परिकल्पना ही बेमानी लगती है। .आखिर अपने ही राज्य में दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर करने वाले इन तथाकथित जनप्रतिनिधियों को सबक तो मिलना ही चाहिए.
वहीं किसी अनजान ने कहा है कि मदन कौशिक उत्तराखण्ड का मुलायम सिह है जो पहाड और मैदान वासियों को आपस में बांटता रहां है और अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकता रहा है। दिवाकर भटट भी कुछ खास नहीं कर पाया जितनी कि इनसे उम्मीद थी 17 खनन के पटटे इनके पास हैं और उत्तराखडियों को बेवकूफ बना रहा है । सावधान ऐसे नेताओं से इनसे तो भले और नेता हैं
कुल मिलाकर क्षेत्रीय बोलियों का मसला विवादित स्वरूप ले चुका है। लेकिन यह बात दीगर है कि पर्वतीय क्षेत्र के सूदूरवर्ती इलाकों में नौकरी करने वाले को स्थानीय बोली भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है अन्यथा भैस के आगे बीन बजाने वाली कहावत उत्तराखण्ड में सही साबित हो सकती है। ं

 

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भारतीय सेना को मिले 518 नए अफसर

भारतीय सेना को मिले 518 नए अफसर

12 असम राइफल्स व 4 भूटान के कैडेट भी हुए पास आउट

राजेन्द्र जोशी

देहरादून। ‘ये जिन्दगी है कौम की, कौम पर लुटाये जा‘ की धुन पर भारतीय सैन्य अकादमी के ड्रिल स्क्वायर पर सधे व नपे तुले हुये कदमों से अन्तिम पग पार करने के बाद आज 518 युवा अफसर भारतीय सेना की मुख्य धारा मे जुड गये। परेड में 12 असम राइफल्स व 4 मित्र देश भूटान के कैडैट भी शामिल हुये। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था व पैनी निगाहों के बीच भारतीय सैन्य अकादमी में शनिवार को हुई पासिंग आउट परेड की सलामी थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.के.सिह ने ली। इस दौरान उन्होंने परेड का निरीक्षण करने के साथ उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कैडेटों को सम्मानित भी किया। हांलाकि इससे पूर्व ड्रिल स्क्वायर में परेड के प्रवेश के बाद सर्वप्रथम उप समादेशक व मुख्य प्रशिक्षक ब्रिगेडियर जी.एस.बल तथा बाद में समादेशक ले.ज. राजेन्द्र सिंह सुजलाना ने परेड की सलामी ली। इस अवसर पर मुख्य अतिथि जनरल वी के सिंह ने कहा कि अच्छे अफसर की योग्यता व पहचान उसके सम्मान, चरित्र व निपुणता से होती है। उन्होंने कहा कि देश की रक्षा के लिये हथियार उठाना एक दुर्लभ सम्मान है तो भी एक योद्धा का काम किसी भी तरह आसान नहीं है। इसके लिये शारीरिक और नैतिक साहस, दक्षता, काम में प्रवीणता तथा नेतृृत्व करने की काबिलियत की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि रेजीमेंट का नाम व निशान इसके सदस्यों से ही कायम रहता है। इसलिये अपनी यूनिट की सम्मान व इज्जत को ऊंचा बनाये रखने के लिये कठिन मेहनत करनी होगी। साथ ही जिन्हें नेतृत्व करने का मौका मिला है उनके सम्मान और इज्जत को भी कायम करना होगा। पास आउट होने वाले कैडेटों के परिजनों को बधाई देते हुये उन्होंने कैडेटों का आह्वान किया कि आईएमए में सैन्य प्रशिक्षण के बाद सेना में शामिल होकर न सिर्फ वीरता व विवेक की पहचान को आगे बढायेगें अपितु भारतीय सेना में अपनी उत्कृष्टता को भी साबित करेगें। इस दौरान परेड के समय हर कदम पर नये आयाम छूने व देश रक्षा का जज्बा लिये इन कैडेट्स के चेहरे की चमक यह एहसास करा रही थी कि भारत मजबूत हाथों व फौलादी इरादों वाले नवयुवकों की सरपरस्ती में पूरी तरह से सुरक्षित है। तमाम कार्यक्रमों के बाद कैडेट्स ने चैटवुड भवन में तीन द्वारों से अन्तिम पग पार करते हुये नई दुनिया में प्रवेश किया ठीक उसी दौरान हैलीकॉप्टरों ने परेड के ऊपर से उड़ान भरते हुये कैडेटों के ऊपर पुष्प वर्षा करते हुये उनको भावी जीवन के लिये शुभकामनायें दी। बाद में निजाम पवेलियन में पीपिंग सैरेमनी का आयोजन किया गया जहां परिजनों ने अपने लाल को तथा थलसेना अध्यक्ष ने मित्र देश के कैडेटों के कंधों पर सितारे लगाए।

उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कैडेट हुए सम्मानित गजेन्द्र कुमावत को स्वॉर्ड ऑफ ऑनर सम्मान

राजेन्द्र जोशी

देहरादून। प्रशिक्षण सत्र के दौरान उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कैडेटों को पासिंग आउट परेड के दौरान तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच मुख्य अतिथि थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.के.सिंह ने सम्मानित किया। शनिवार को आईएमए में आयोजित परेड में थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने हर क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिये गजेन्द्र कुमावत को स्वॉर्ड ऑफ ऑनर सम्मान के साथ रजत पदक भी दिया। इसी तरह स्वर्ण पदक जयदेव डांगी व कांस्य पदक गौरव सिंह को मिला। इसके अलावा टेक्निकल ग्रेजुएट कोर्स में प्रथम स्थान प्रदान करने वाले सचिन किशन को रजत पदक तथा टेक्निकल एन्ट्री स्कीम में प्रथम आने पर अरूण आनन्द को रजत पदक से सम्मानित किया। साथ ही साथ कैरेन कंपनी को चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ बैनर मुख्य अतिथि के द्वारा दिया गया।

आई.एम.ए. के इतिहास में जुडा एक और यादगार पन्ना

राजेन्द्र जोशी

देहरादून। शनिवार को आयोजित पासिंग आउट परेड के साथ ही आईएमए के इतिहास में एक और पन्ना जुड गया। इस संस्थान से 50 हजार से अधिक कैडेट प्रशिक्षण प्राप्त करके सैन्य जीवन की मुख्य धारा में शामिल हो गये। भारतीय सैन्य अकादमी के 78 वर्ष के सफर में प्रशिक्षित नव सैन्य अधिकारियों की संख्या आज 50475 तक पहुंच गयी। इस संख्या के बाद आईएमए के इतिहास में एक और स्वर्णिम पन्ना जुड़ गया। यहां संख्या अपेक्षाकृत पुरानी आस्ट्रेलिया स्थित डनट्रन एकेडमी से पास आउट जैन्टल मैन कैडेटों की संख्या से कही अधिक है। आईएमए के पहले बैच में कुल 40 जैन्टल मैन कैडेट थे जिनमें से बाद में 3 ने अलग-अलग देशों के सेनाध्यक्षों का पदभार संभाला। फील्ड मार्शल सैम मानिक शॉ जहां भारतीय सेना के सर्वोच्च पद पर पहुंच वहीं स्मिथ डन ने बर्मा तथा मुहम्मद मूसा ने पाक सेनाध्यक्ष का महत्व पूर्ण पद संभाला।

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कम दागदार नहीं है जनरल का दामन

कम दागदार नहीं है जनरल का दामन
ग्रामीणों की शिकायत के बाद भी आखिर कैसे हो गई रामदेव बाबा को भूमि आवंटित
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 28 नवम्बर । छाती पीट-पीट कर अपने को ईमानदार बताने वाले पूर्व मुख्यमंत्री खंण्डूरी की ईमानदारी पर अंगुली उठने लगी हैं। वर्ष 2007 में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से लेकर 27 जून 2009 तक जनरल के कार्यकाल में हुए घोटालों की पोल अब खुलने लगी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचन्द्र खण्डूरी पर उनकी ही अपनी पार्टी व  सरकार द्वारा बहुचर्चित जलविद्युत परियोजनओ ंके घोटाले में सीधे तौर जिम्मेदार बताये जाने के बाद अब योग गुरू रामदेव ने भी उनकी ही कथित ईमानदारी को निशाना बनाकर भू-उपयोग परिवर्तन के मामले में दो करोड़ रूपये रिश्वत मांगे जाने का मामला उठा कर उत्तराखण्ड की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
हांलाकि खंण्डूरी ने बाबा रामदेव के इस आरोप का खण्डन करते हुए स्वयं को इस रिश्वत प्रकरण से अलग बताया है लेकिन बाबा रामदेव और उनके सहायक आचार्य बालकृष्ण द्वारा अब भी डंके की चोट पर कहा जा रहा है कि उनसे भू-उपयोग परिवर्तन के मामले में दो करोड़ रूपये की रिश्वत मांगी गयी थी और वे जल्दी ही सप्रमाण इसका खुलासा भी करने जा रहे हैं हांलांकि उन्होने इस रिश्वत प्रकरण में किसी का नाम तो नहीं लिया है लेकिन यह कहकर कि दो साल पहले यह रिश्वत मांगी गयी थी, नाम न लेते हुए भी सीधे निशाना पूर्व मुख्यमंत्री जनरल की ओर है। यही कारण है कि पार्टी खुलकर उनका साथ नहीं दे पा रही है और जनरल अलग-थलग पडते हुए खुद ही अपनी सफाई देते फिर रहे हैं। मामला चाहे लघु सिंचाई विभाग के विभागाध्यक्ष असगर अली का हो जिसने कागजों में गूल बनाकर पहाड़ी खेतों को हरा भरा करने का करतब दिखाया हो अथवा जलविद्युत निगम के अध्यक्ष प्रबंध निदेशक रहे योगेन्द्र प्रसाद का। योगेन्द्र प्रसाद को पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने उनके अनुभवों को देखते हुए मुख्यमंत्री का ऊर्जा सलाहकार बनाया था, लेकिन जनरल के लाड़ले सारंगी ने इन्हें लाखों रूपये वेतनमान पर रखते हुए इन्हें जलविद्युत निगम को चेयरमैन. तक बना डाला। जिन्होंने मनेरी भाली फेस-1 तथा मनेरी भाली फेस-2 परियोजनाओं में रेत की सफाई के नाम पर सरकार पर करोड़ों रूपये का चूना तो लगाया ही साथ ही इन पर अपने चहेतों को ठेके देने का आरोप भी है। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री निशंक के आने के बाद इनके काले कारनामों की जब जांच हुई तो कई करोड़ रूपयों का घोटाला सामने आया। जिनकी जांच सतर्ककता विभाग कर रहा है।

चर्चाओं के अनुसार जनरल के शासन काल में अस्थाई राजधानी देहरादून सहित हरिद्वार व उधमसिंह नगर के रूद्रपुर व नैनीताल के हल्द्वानी आदि कई स्थानों पर भू-उपयोग परिवर्तन के कई घोटालें सामने आए। इतना ही नहीं अपनी पत्नी  के नाम हर्रावाला क्षेत्र में साढे़ बारह बीघे जमीन को लेकर भी तत्कालीन समय में काफी हो हल्ला मचा था, लेकिन यह मामला भी अन्य मामलों की तरह दबा दिया गया। इतना ही नहीं जनरल शासन में जनरल के लाड़ले रहे सारंगी के भाई के दबाव के चलते पचास रूपये की सी.डी. दो हजार रूपये में कई विभागों को जबरन खरीदने पर मजबूर किया। यह मामला भी जब सामने आया तो पता लगा कि न्यू इंक पब्लिकेशन प्राईवेट लि. ने उत्तरांचल इन्फोरमेशन सिस्टम के नाम से यह सी.डी. विभिन्न विभागों को बेची, जबकि चर्चाओं के अनुसार प्रदेश सरकार द्वारा राज्य के तमाम जनपदों, तहसीलों, विकासखण्ड स्तर से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक की संकलित की गई सभी जानकारियां सरकार के मातहत अधिकारियों के द्वारा ही इस कंपनी को मुहैया कराई गई और इस कंपनी ने इसी सरकारी जानकारी की सी.डी. बनाते हुए इसे सरकारी विभागों को ही बेचना शुरू कर दिया था। वहीं जनरल पर प्रदेश की 56 जलविद्युत परियोजनाओं के आंवंटन में गडबड़ी का आरोप भी है जिसके चलते वर्तमान मुख्यमंत्री को यह सब परियोजनओं का आवंटन निरस्त करना पड़ा था।
जहां तक बाबा रामदेव द्वारा एक मंत्री पर दो करोड़ रूपये घूस में मांगने का आरोप लगाया गया उस समय जनरल कुर्सी मुख्यमंत्री थे, यदि बाबा की बातों पर भरोसा किया जाए तो उन्होंने जनरल को इस मामले की खबर दी थी। लेकिन जनरल ने इसे सीधे लेने के बजाय डोनेशन के रूप में देने की बात बाबा से कही थी। इतना ही नहीं तत्कालीनसमय में ओरंगाबाद ग्रामीण क्षेत्र के लोगों ने स्वामी रामदेव द्वारा ग्राम समाज की भूमि अवैध तरीके से अधिगृहित करने के बारे में 17 मई 2008 को जनरल को एक पत्र दिया था जिसमें उन्होंने कहा कि पतंजलि योगपीठ हरिद्वार द्वारा ग्राम ओरंगाबाद परगना रूडकी तहसील जनपद हरिद्वार की ग्राम समाज की लगभग 1464 बीघे भूमि तथा ग्राम तेलीवाला की लगभग 600 बीघा भूमि बिना अनुमति के अधिगृहित करने की शिकायत की थी, लेकिन जनरल ने ग्रामीणों की शिकायतों को दरकिनार करते हुए 16 जुलाई 2008 को शासनादेश संख्या 56/भू क्रय 18(1)/7 के द्वारा 750 बीघा (50) है. ओरंगाबाद, शिवदास पुर उर्फ  तेलीवाला, शांतरशाह तथा बाहादरपुर में आवंटित कर दी। चर्चाओं के अनुसार बाबा रामदेव ने इसी जमीन को आवंटित कराने व इसके भू-उपयोग परिवर्तन के ऐवज में तत्कालीन सरकार पर दो करोड़ रूपये मांगने का आरोप लगा था।

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