खण्डूड़ी और कोष्यारी की लड़ाई में उत्तराखण्ड की हार
जयसिंह रावत -
उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी और पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोष्यारी के बीच छिड़ी कुर्सी की जंग में जीत भले ही जिसकी भी हो मगर इसमें इस नवगठित राज्य और उसकी जनता की हार तय है। यह हार का सिलसिला आज से नहीं बल्कि अन्तरिम सरकार के पहले मुख्यमंत्री नित्या नन्द स्वामी की सत्ता से बेदखली के साथ ही शुरू हो गया था। भारत के 27 वें राज्य के रूप में कुछ ही वर्ष पूर्व अस्तित्व में आने वाले उत्तराखण्ड के वर्तमान और भविष्य को सत्ता के लोलुपों ने रौंद डाला है। इसमें असली भूमिका अब भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व अदा कर रहा है। खण्डूड़ी और कोष्यारी के बीच चल रहे इस सत्ता संघषर््ा के कारण अनिष्चितता का माहौल है और खण्डूड़ी चाहे जायें या नहीं मगर नौकर शाह महीनों से उनके जाने का ही इन्तजार कर रहे हैं। इस अनिष्चितता के माहौल में विकास कार्य ठप्प हो गये हैं। नौकरषाही पहले ही खण्डूड़ी के बूते से बाहर हो रही थी मगर अब तो समूचा प्रषासन ही पंगु हो गया है। कई सचिव तो सचिवालय में बैठ भी नहीं रहे हैं। खण्डूड़ी द्वारा लिये गये निर्णयों पर कार्यवाही के लिये उनके आइ.ए.एस. सचिवों को बार-बार रिमाइण्डर भेजने पड़ रहे हैं। फरवरी 2007 में विधानसभा चुनावों तथा मार्च 2007 में भुवन चन्द्र खण्डूड़ी के नेतृत्व में इस सरकार के सत्ता में आने के बाद कुल 6 छोटे बड़े चुनाव राज्य में हो गये और इतनी ही बार चुनाव आचार संहिता के लागू होने के कारण विकास की गति लगभग रुक सी गयी है। इसमें दो उप चुनावों के लिये अकेले मुख्यमंत्री खण्डूड़ी ही जिम्मदार रहे हैं क्योंकि उन्हें जनता ने दिल्ली भेजा था मगर उनका दिल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आ गया । इस साल तो विकास का पहिया लगभग जाम की स्थिति में है और अब तो कुर्सी की इस लड़ाई के कारण विकास का मामला महत्वहीन ही हो कर रह गया है। विभाग विकास के लिये आबंटित धनराषि खर्च नहीं कर पा रहे हैं। आगे भी विकास की सम्भावना नहीं है क्यांेकि खण्डूड़ी ने वाह वाही लूटने के लिये संसाधनों का जायजा लिये बिना ही राज्य में छटे वेतन आयोग की सिफारिषें लागू कर दी हैं। उससे राज्य पर हजारों करोड़ का बोझ तो पड़ गया मगर आय का अभी कहीं पता नहीं है। खण्डूड़ी और कोष्यारी के बीच की इस जंग का विकास और प्रषासन पर तो असर पड़ ही रहा है साथ ही इससे माहौल भी खराब हो रहा है। देखा जाय तो इस लड़ाई में इस्तेमाल किये जा रहे हथकण्डों से उत्तराखण्ड राज्य की जनता की लड़ाई का ही मकसद फेल होने जा रहा है। कुर्सी के खेल में जातिवाद और क्षेत्रवाद के घटिया हथकण्डों ने सड़ांध पैदा कर दी है। हैरानी की बात तो यह है कि मीडिया को तक ऐसे हथकण्डों से बांटा जा रहा है। नतीजा यह है कि मीडिया में सच के सामने आने के बजाय प्लाण्टेड खबरें आ रही हैं। हाल यह है कि आज की तारीख में उत्तराखण्ड के अखबारों में छपी किसी भी खबर पर विष्वास करना कठिन हो गया है। हिन्दी अखबारों का तो बुरा हाल है। कुछ सरकार को बचाने तो कुछ सरकार को गिराने के लिये कितना भी बड़ा सफेद झूठ बोलने में नहीं हिचकिचा रहे हैं। हद तो तब हो गयी जब कि भाजपा के 17 विधायकों ने राजनाथ को इस्तीफे भेज दिये और उनका मजमून भी कुछ अखबारों में छप गया और इसके बाद भी कुछ अखबारों ने प्रथम पृष्ठ पर लीड खबर बना कर इसे महज अफवाह घोषित कर दिया। उत्तराखण्ड के मौजूदा सत्ता संघर्ष से पहले इसकी पृष्ठ भूमि में जाना होगा। दरअसल इसकी शुरुआत नित्यानन्द स्वामी के साथ ही शुरू हो गयी थी। स्वामी की उत्तराखण्ड आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पृथक राज्य के मुद्दे पर स्वामी और तत्कालीन मुख्यमंत्री के बीच का टकराव संवैधानिक संकट की हद तक पंहुंच गया था। बाद में पृथक राज्य के हकीकत बननें पर जब स्वामी केा ही पहला मुख्यमंत्री बनाया गया तो कुर्सी की ऐसी ही लड़ाई में स्वामी को बाहरी और गैर पहाड़ी बता कर उनके खिलाफ बाकायदा लामबन्दी की गयी और उस बुजुर्ग उत्तराखण्डी को भाजपा नेतृत्व ने सत्ता से बाहर कर दिया। इसके बाद पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में भारत के सर्वाधिक अनुभवी राजनेता नारायण दत्त तिवारी की ताजपोषी हुयी तो शुरू से लेकर आखिर तक तत्कालीन प्रदेष कांग्रेस अध्यक्ष हरीष रावत निरन्तर तिवारी की छाती में मूंग दलते रहे। नतीजा यह हुआ कि तिवारी यहां अपने अनुभवों का लाभ राज्य को देने के बजाय हर रोज उत्तराखण्ड से मुक्ति की प्रार्थना करते रहे। यह सच है कि राज्य के विकास की जितनी मजबूत बुनियाद तिवारी ने रखी वहां तक इस कुर्सी के किसी भी दावेदार की कल्पना तक नहीं जा सकती। मगर यह भी सच है कि तिवारी ने अपनी इज्जत अपनों से ही बचाने के लिये लाल बत्तियां बांटने जैसे कुछ ऐसे भी काम किये हैं जिनका खामियाजा उत्तराखण्ड की भावी पीढ़ियां भी भुगतेंगी। उस जमाने में मंत्री स्तर के इतने पद बंटे कि वह भविष्य के लिये नजीर बन गयी। भविष्य में अगर विधायकों को ऐसे पद नहीं मिले तो प्रदेष में सरकार की स्थिरता की कल्पना भी नहीं की जा सकेगी। उत्तराखण्ड आज खण्डूड़ी और कोष्यारी के बीच लड़ाई का कुरुक्षेत्र बना हुआ है। उसके लिये इन दोनों से ज्यादा भाजपा हाई कमान जिम्मेदार है। दरअसल यह बड़ी पाटियों के बड़े नेताओं की औपनिवेषिक सोच का ही दुष्परिणाम है। दिल्ली में बैठे नेता अपनी साम्राज्यवाद जैसी सोच के चलते राज्यों में लोकतांत्रिक तरीके से नेता चुनने का अवसर देने के बजाय अपनी बफादार या कमाऊपूत को राज्यों पर थोप देते हैं। राज्य में मुख्यमंत्री बहुमत वाले दल के बहुमत का नेता होता है। मगर उत्तराखण्ड में भुवन चन्द्र खण्डूड़ी न तो नेता चुने जाते समय बहुमत में थे और ना ही उनके पास आज पार्टी विधायकों का बहुमत है। कोष्यारी ने गत 10 अगस्त को 36 में से 27 भाजपा विधायकों की दिल्ली में परेड करा कर खण्डूड़ी की असलियत आडवाणी या राजनाथ ही नहीं बल्कि सारे देष को बता दी थी। हमें याद है कि 2 मार्च 2007 को नव निर्वाचित भाजपा विधायक दल की बैठक में खण्डूड़ी को नेता मनवाने के एक लाइन के प्रस्ताव को पारित कराने में 6 घण्टे का समय लगा था। क्योंकि उस समय के 34 में से आधा दर्जन विधायक भी खण्डूड़ी के साथ नहीं थे ।जबकि सीधे सादे कोष्यारी के लिये 25 नवनिर्वाचित विधायक उसी दिन इस्तीफा देने को तैयार थे। इसके बाद भी भाजपा आला कमान खण्डूड़ी को मुख्यमंत्री बनाने पर अड़ा रहा। यह शायद इसलिये कि सुबह शाम थोड़ी सी खिचड़ी खाने वाला ठेठ पहाड़ी कोष्यारी दिल्ली के कुछ नेताओं के काम का नहीं था। कोष्यारी के लिये आज भी उतने ही विधायक कहीं भी जाने को तैयार हैं जबकि फौज के मेजर जनरल सत्ता का उपयोग करने और तमाम वाद उठने पर भी अपने चहेतों की संख्या नहीं बढ़ा पाये। भाजपा मार्च 2007 के बाद हुये छोटे बड़े सभी चुनावों में आषानुकूल नतीजे हासिल नहीं कर पाई। पौड़ी लोक सभा उपचुनाव में तो भाजपा प्रत्याषी 108 मतों से जनता के सीधे मतों से हार गया था लेकिन विवादास्पद फौजी डाक मतपत्रों ने भाजपा की इज्जत बचा दी। इसके बाद भी भाजपा आला कमान का खण्डूड़ी के प्रति मोह भंग नहीं हुआ। देष या प्रदेषों में जब कभी भी ऐसी कुर्सी की लड़ाई होती है तो कुर्सी बचाने के लिये सदैव जनता क हितों की बलि चढ़ती है। इस बार भी उत्तराखण्ड में भी यही होने जा रहा है। विधायकों को पटाने के खेल में सत्ताधारी किसी भी हद तक जा सकते हैं। अब तो खण्डूड़ी ने भी कोष्यारी पर सीधे वार करना शुरू कर दिया है। लगता है कि अब संघर्ष निर्णायक मोड़ पर आ गया है। इसमें या तो खण्डूड़ी हटेंगे या फिर कोष्यारी बाहर जाते जाते प्रदेष में भाजपा को भी सत्ता से बाहर जाने का रास्ता दिखायेंगे।