प्रदेश प्रभारियों की भूमिका पर सवाल , कार्यकर्ताओं की अनदेखी के कारण हुआ यह हाल
तो क्या कर रहे हैं भाजपा के प्रदेश प्रभारी कृष्ण मुरारी मोघे और सह प्रभारी अनिल जैनï? क्योंकि भाजपा के जो हालात हैं उसमें इनकी भूमिका और दायित्वों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। आमतौर पर पार्टी के प्रभारी प्रदेश में पार्टी के अंदरूनी मामलों को सुलझाने का कार्य करते हैं। वे केन्द्रीय नेतृत्व तथा प्रदेश सरकार के बीच सेतु का कार्य करते हैं। लेकिन प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा विधायकों, मंत्रियों तथा पार्टी पदाधिकारियों तथा मुख्यमंत्री के बीच मतभेद दिन प्रति दिन गहराते जा रहे हैं। ऐसे में क्या प्रदेश प्रभारियों को असंतोष दूर करने की पहल नहीं करनी चाहिए थी? और यदि पहल की भी गयी तो असंतोष खत्म क्यों नहीं हुआ? ऐसे में प्रदेश के ये दोनों प्रभारी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। प्रदेश में श्री खंण्डूड़ी को मुख्यमंत्री बनाये जाने के दिन से ही विवाद शुरू हो गया था। भाजपा के ही वरिष्ठï कार्यकर्ताओं का केन्द्रीय नेतृत्व पर आरोप था कि उसने जनभावनाओं का निरादर करते हुए पैराशूट से खंण्डूड़ी को उतार मुख्यमंत्री का ताज पहना दिया। जबकि उस व्यक्ति को जिसने प्रदेश में भाजपा की सरकार लाने को दिन रात एक किया उसे दरकिनार किया गया। लेकिन पार्टी हाईकमान ने इसका नोटिस नहीं लिया । हालांकि सरकार तथा पार्टी के बीच समन्वय के लिए एक समिति भी बनाई गयी थी जिसमें भगत सिंह कोश्यारी भी शामिल थे। लेकिन वह समिति इस लिए कार्य नहीं कर पायी क्योंकि सरकार ने समिति की बातों को माना ही नहीं यही बजह रही कि एक दिन समिति भी ठंडी हो गयी। जानकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री के स्वभाव और व्यवहार के कारण ही इस समिति का यह हश्र हुआ। इस बीच प्रदेश नेतृत्व के कार्यव्यवहार से राज्य के विधायकों,मंत्रियों तथा पदाधिकारियों में असंतोष दिन प्रति दिन बढ़ता चला गया और अब तो हालात ”जंगÓÓ तक पहुंच गये हैं। इसका भरपूर फायदा कुछ ही लोगों ने उठाया है। इससे पूर्व भी भाजपा शासन में नेतृत्व को लेकर विवाद रहा है। नेतृत्व परिवर्तन के जरिये ये विवाद खत्म करने की कोशिश की गयी। लेकिन पार्टी में एकजुटता नहीं आयी और पार्टी के ही धुरंधर एक दूसरे को हराने में लगे रहे, ताकि प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिए इनका रास्ता मजबूत रहे। इस बारे में प्रदेश में मंत्री रह चुके केदार सिंह फोनिया ने के न्द्रीय नेतृत्व को पत्र भी लिखा था जिसमें उन्होने राज्य के एक मंत्री पर आरोप लगाया था कि उन्हे हरवाने के लिये मंत्री ने कार्य किया है। इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों को चुनाव में पटखनी देने के लिये आला नेताओं ने कार्य किया था। इसका परिणाम यह रहा कि अलग राज्य के साथ ही कई सारी योजनाओं व रियायतें देने वाली भाजपा 19 सीटों पर जाकर सिमट गयी। यही नहीं पिछले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के कुछ नेता अपने आका के लिए सत्ता का रास्ता मजबूत बनाने हेतु कार्य करते रहे, तभी तो भाजपा को सत्ता में आने के लिए निर्दलीयों व उक्रांद को साथ लेना पड़ा। सवाल यह है कि राज्य गठन के बाद से ही भाजपा में चल रहे शह और मात के खेल पर पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने क्यों नहीं ध्यान दिया और शुरू में ही केन्द्रीय नेतृत्व इन घटनाओं को गंभीरता से लेता तो शायद आज अनुशासित कही जाने वाली पार्टी में गुटबंदी खुलकर सामने नहीं आती। ऐसे में एक बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में भाजपा की आज के हालात के लिए केन्द्रीय नेतृत्व के साथ ही प्रदेश प्रभारी भी जिम्मेदार हैं जिन्होने सही स्थिति केन्द्र के सामने नहीं रखी और एकतरफा व्यवहार व अपने स्वार्थो के कारण पार्टी को इन हालातों तक पहुंचाया।