सम्मान समारोह प्रायोजित अथवा राजनैतिक!
राजेन्द्र जोशी
पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूडी को लगभग 10 सालों बाद सड़कों के पुर्ननिर्माण को लेकर पुरस्कृत किया जाना पूरी तरह से राजनैतिक व प्रायोजित लगता है। जनरल खण्डूडी राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व काल में कार्य कर चुके हैं। इतने वर्षों बाद सड़क निर्माण के लिए खण्डूडी को सम्मानित किए जाने पर राजनैतिक हलकों में यह मामला खासा चर्चा का विषय बन गया है। इनका कहना है कि आिखर पुरस्कृत करने वाले और पुरस्कृत होने वाले इतने सालों तक कहां सोऐ रहे। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण सड़कों से नहीं बल्कि चारित्रिक उत्थान एवं सांस्कृतिक पुर्नजागरण से होता है और पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में यह दोनो चीजें ही गायब रही। विश्लेषकों का कहना है कि जहां तक चारित्रिक उत्थान का सवाल है पूर्व मुख्यमंत्री के शासन काल में भ्रष्टाचार चरम पर था और मुख्यमंत्री के नाक के नीचें उनका लाडला सारंगी व उसकी फौज जमकर लूट मचा रही थी और जहां तक चारित्रित उत्थान का सवाल है तो पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री खण्डूडी के शासनकाल में एक ईमानदार अधिकारी सत्येंद्र दूबे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। जबकि एक जानकारी के अनुसार सत्येंद्र दूबे ने भूतल परिवहन मंत्रालय को माफियाओं से अपनी जान का खतरा बताते हुए पहले ही आगाह कर दिया था, लेकिन भूतल मंत्रालय ने उनके इस पत्र को रद्दी के टोकरी में डाल दिया। इसका यह परिणाम हुआ कि सत्येंद्र दूबे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश की राजनीति में लगभग हासिये पर खिसक चुके पूर्व मुख्यमंत्री खण्डूडी इस तरह के प्रायोजित पुरस्कारों से प्रदेश की राजनीति कि मुख्यधारा में नहीं आ सकते। इसके लिए उन्हें पदलोलुपता को तिलांजलि देते हुए सामाजिक पुर्ननिर्माण के लिए निस्वार्थ भाग से काम करना होगा। विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह योजना आयोग के उपाध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी ने बीते दिनों यह घोषणा की कि अब 70 वर्ष के बाद वे सक्रिय राजनीति से सन्यास लेंगे और पार्टी को बुजुर्ग की हैसियत से सलाह देते रहेंगे। उनका यह भी कहना है कि प्रदेश की राजनीति में अब युवाओं को अवसर दिए जाने चाहिए। ताकि ऊर्जावान लोग राजनीति में आए। प्रदेश के लोगों ने उनकी इस घोषणा को प्रदेश की राजनीति में सक्रिय लोगों ने हाथों हाथ लिया है और इसे पार्टी के लिए सकारात्मक कदम भी बताया। राजनैनिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश की जनता के खण्डूडी को बहुत ऊंचे मुकाम तक पहुंचाया और उन्हें भी जनभावनाओं का आदर करते हुए और अपने वरिष्ठ नेता मनोहर कांत ध्यानी के सिद्धांतों पर अमल करते हुए प्रदेश की सियासत में युवाओं को आगे आने का रास्ता देना चाहिए और ये पुरस्कारों के प्रायोजित समारोह का लोभ सवंरण करना चाहिए।
बहरहाल खण्डूडी को 10 साल बाद मिलें पुरस्कार से राजनैतिक नफानुकसान हुआ हो या नहीं लेकिन इस कार्यक्रम ने राजनैतिक हलकों में पूर्व मुख्यमंत्री को कोई खासा लाभ नहीं दिखाई दे रहा है।