संभव है आज 27 रूपये 66 पैसे में दो जून की रोटी!
भ्रष्टाचार के समुद्र में डूबी कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयी व्यवस्था
भेड़-बकरियों की तरह एक कमरे में ठूंसी जा रही हैं छात्राएं
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 22 फरवरी। भेड़-बकरियों की तरह एक अदने से कमरे में सबको शिक्षा का नारा देने वाली भारत सरकार की कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका शिक्षा योजना उत्तराखण्ड में शिक्षाविदों को मुंह चिढ़ा रही है। प्रतिवर्ष करोड़ों रूपया समाज में शिक्षा से विमुख हो रहे ऐसी छात्राओं को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने पर खर्च किया जा रहा है, लेकिन भारत सरकार की यह योजना कितनी परवान चढ़ती है। इसकी बानगी उत्तराखण्ड में देखी जा सकती है। हम बात कर रहे हैं, सर्व शिक्षा अभियान कार्यक्रम के तहत उत्तराखण्ड में चलने वाले कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका शिक्षा विद्यालयों की। 27 रूपया 66 पैसे प्रतिदिन में क्या आज दो जून की रोटी, दो चाय और एक नाश्ता मयस्सर हो सकता है। आपका जवाब होगा नहीं, लेकिन उत्तराखण्ड में यह सब हो रहा है और यह सब कैसे चल रहा है यह भगवान ही जान सकता है।
20 रूपये किलो चावल, 18 रूपये किलो आटा और 6 रूपये कप चाय के जमाने में प्रदेश का शिक्षा विभाग छात्राओं की पेट की आग को 27 रूपये 66 पैसे प्रतिदिन में कैसे कैसे शांत कर रहा होगा यह तो वही बता सकते हैं, लेकिन इसमें कुछ गोलमाल जरूर है। या तो छात्राओं की संख्या हकीकत से कुछ ज्यादा सरकारी दस्तावेजों में दर्शायी जाती है या फिर कुछ और। 10 गुणा 12 के कमरे में 20-20 छात्राएं वह भी कुछ पलंग पर और कुछ पलंग के नीचे सुलाई जा रही है। यह बानगी तो प्रदेश के उत्तरकाशी जिले के मोरी कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की है। जहां न तो विद्यालय भवन है और ना ही किराए के भवन में समुचित व्यवस्था। रात को शराबी सड़के से सटे इस विद्यालय में धमाचौकड़ी भी मचा देते हैं। क्योंकि जहां यह विद्यालय बना है वहां किसी भी तरह की सुरक्षा व्यवस्था अथवा परिसर की सुरक्षा दीवार तक नहीं है ताकि असमाजिक तत्वों को विद्यालय में आने से रोका जा सके। ऊर्जा प्रदेश का दावा करने वाले उत्तराखण्ड के इस क्षेत्र में कभी-कभार ही बिजली देखने को मिलती है। ऐसे में इस विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रही छात्राएं कैसे शिक्षा प्राप्त कर रही होंगी यह आप स्वंय समझ सकते हैं। आठ से अट्ठारह वर्ष तक की बालिकाओं के लिए शौचालय तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। मुंह अंधेरे छात्राओं को नित्य कर्म के लिए खेतों की ओर रूखसत होना पड़ता है। यह बानगी तो केवल एक विद्यालय की है। इसी जिले के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय कण्डियाल गांव में 25 लाख रूपये खर्च होने के बावजूद भी बीते पांच सालों से निर्माणाधीन विद्यालय भवन पूरा नहीं हो पाया है। ठीक यही हाल केजीबीबी गंगनानी (बड़कोट), केजीबीबी धनपुर (उत्तरकाशी) जहां होटल के कुछ कमरों में यह विद्यालय चल रहा है। इनमें से ज्यादातर विद्यालय 20 हजार से 30 हजार रूपये प्रतिमाह किराए पर केजीबीबी विद्यालय चलाए जा रहे हैं, लेकिन छात्राओं को सुविधा के नाम पर झुनझुना ही दिखाया जाता है। ऐसे में शिक्षा की मुख्यधारा से अलग हुई छात्राएं शिक्षा के प्रति कैसे अपना रूझान बना पाएंगी यह तो प्रदेश का शिक्षा विभाग ही जाने।
चर्चा है कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत चलने वाले प्रदेश भर के लगभग 28 कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की शैक्षिक व्यवस्था ने इतना तो अवश्य कर दिया है कि जहां एक ओर इस शिक्षा नीति ने शिक्षा का उजाला उन अंधेरे इलाकों तक पहुंचाने का जिम्मा उठाया है जहां मीलों तक कोई विद्यालय नहीं है और यदि हैं भी तो वहां अध्यापक नहीं है वहीं इन विद्यालयों का जिम्मा उठा रहे अधिकारियों द्वारा इन पोषित विद्यालयों को सरकार द्वारा दिए जाने वाले बड़े बजट के बडे हिस्से को डकारने के मामले में उनको उतना ही बड़ा कमीशनखोर बना दिया है। चाहे छात्राओं का खाने-पहनने की व्यवस्था हो या रहने-सोने की व्यवस्था। एक जानकारी के अनुसार बिना कमीशन लिए यहां कोई भी बिल पास करवाना संभव नहीं हो पाता। चर्चाओं के अनुसार इन विद्यालयों में तैनात वार्डन व स्टॉफ हमेशा भयातुर रहता है कि ना जाने कब कौन सा तुगलकी फरमान उनके अधिकारियों द्वारा जारी कर दिया जाएगा।
गौरतलब हो कि इन विद्यालयों की स्थापना उन बच्चों के लिए की गई थी जो दलित शोषित और शिक्षा से कोसों दूर रहकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं और शिक्षा की मुख्यधारा से काफी दूर थे। इन विद्यालयों में पढ़ने वाली छात्राएं आज 20 से 40 किमी. की पैदल दूरी तय कर शिक्षा का ज्ञान लेने इन विद्यालयों में पहुंचती हैं। वहीं छुट्टियों से पूर्व में अपने अभिभावकों के साथ वापस लौटने के लिए सुबह से शाम तक मिलों पैदल चलने वाली इन छात्राएं केे अभिभावकों को विद्यालय परिसर में ठहरने तक की जगह नहीं मिल पाती। इन गरीब और शोषित अभिभावकों को रात आसरे के लिए जगह-जगह भटकना पड़ता है। यही नहीं पुख्ता सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उत्तरकाशी जनपद में चारों कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों को संचालित करने वाले सर्व शिक्षा अभियान के जिलों में तैनात अधिकारी इन विद्यालयों में तैनात संचालिकाओं को अपनी अंगुलियों पर नचाते फिरते हैं। यही हाल प्रदेश के अधिकतर कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों का है। यहां कब विभागीय अधिकारी क्या फरमान जारी कर दें, कहा नहीं जा सकता।
नियमानुसार इन विद्यालयों में तैनात महिला कर्मचारियों को निर्देश हैं कि वे विद्यालय परिसर में अपने परिवार के साथ भी नहीं रह सकते और न ही किसी को सांय चार बजे बाद विद्यालय परिसर में प्रवेश की अनुमति है। चर्चाओं के अनुसार सर्व शिक्षा अभियान के तहत इन विद्यालयों का जिम्मा देख रहे मातहत अधिकारी अकसर सांय चार बजे बाद ही इन विद्यालयों की ओर शराब पीकर रूख करते हैं, जिससे इन विद्यालयों के संचालकों के सामने समस्या पैदा हो जाती है कि वे अपने अधिकारियों की जी हुजूरी करें अथवा नियमों का पालन।
करोड़ों रूपये सर्व शिक्षा अभियान पर व्यय कर रही भारत सरकार प्रतिमाह किराए के रूप में 20 से 50 हजार रूपये प्रति विद्यालय देने से भी गुरेज नहीं कर रही है। वहीं लाखों रूपये खर्च करने के बाद भी आधे-अधूरे पड़े निर्माणाधीन विद्यालय अब जर्जर होकर दोबारा टूटने के कगार पर है। सूत्रों ने तो यहां तक बताया है कि विभागीय अधिकारियों की स्थानीय भवन स्वामियों से मिली भगत के कारण विभागीय भवनों का निर्माण पूरा नहीं कराया जा रहा है। क्योंकि विभागीय अधिकारियों को भवन स्वामियों से किराए के रूप में हजारों रूपये प्रतिमाह कमीशन मिल रही है। ऐसे में ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगना लाजमी है। कमोबेश यही हाल प्रदेश में संचालित हो रहे 28 केजीबीबी के भी हैं। एक जानकारी के अनुसार राज्यभर में कहीं भी विद्यालय के लिए भवन नहीं है और संचालित किए जा रहे विद्यालय बदहाली की स्थिति में है। इस विषय पर जब सर्व शिक्षा अभियान से जुड़े अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई तो कई अधिकारियों के फोन बंद मिले और जिनके फोन मिले भी उन्होंने इस विषय पर बोलने से मना कर दिया।
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