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अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगात्मक परीक्षा में राज्य हो रहा फिसड्डी साबित

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अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगात्मक परीक्षा में राज्य हो रहा फिसड्डी साबित
अध्यापकों को शिक्षा की नहीं सुविधा की दरकार
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 25 फरवरी। पिछले दो दशकों से उत्तराखण्ड की शिक्षा व्यवस्था पटरी पर नहीं है। यही कारण है कि अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित होने वाले प्रतियोगात्मक परीक्षाओं में 67 फीसदी साक्षर दर वाले उत्तराखण्ड से पास होने वाले अभियर्थीयों की संख्या दहाई अंक भी पार नहीं कर पा रही है। राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर शिक्षाविद सहित तमाम ब्यूरोक्रेट तक चिंतित दिखाई दे रहे हैं। यहां तक की प्रमुख सचिव स्तर के एक अधिकारी का यह कहना है जब राज्य की शिक्षा व्यवस्था को मैं पटरी पर नहीं ला सका तो किसी और से क्या उम्मीद की जा सकती है।
राज्य बने अभी मात्र 11 वर्ष ही हुए हैं, लेकिन राज्य की शिक्षा व्यवस्था पिछले 20 वर्षों से बदहाल स्थिति में है। शिक्षा का गढ़ माने जाने वाले उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा, नैनीताल, लोहाद्याट, पौड़ी, जहरीखाल, खिर्सू, श्रीनगर, नागनाथ पोखरी, तलवाड़ी, अगस्तमुनी, गुप्ताकाशी, टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून ऐसे शिक्षा के केंद्र थे जहां से शिक्षा ग्रहण कर छात्रों ने एक मुकाम तब हासिल किया था जब उत्तराखण्ड विकास की दृष्टि से देश के अन्य हिस्सों से बहुत पीछे था। समूचे उत्तराखण्ड की शिक्षा व्यवस्था सरकारी स्कूलों के भरोसे थी और इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र जहां मेधावी हुआ करते थे वहीं इन विद्यालयों में अध्यापन का कार्य कर रहे शिक्षक इतने मेहनती हुआ करते थे कि उन्हें दिन-रात की फिक्र नहीं होती थी और वे अपना पूरा जिवन छात्रों को समर्पित कर देते थे। ऐसे में गुरू शिष्य परंपरा का एक अनूठा उदाहरण उत्तराखण्ड में देखने को मिलता था, लेकिन आधुनिकता के दौड़ में राज्य के शिक्षकों ने शिक्षा ग्रहण करने आ रहे छात्रों को समयबद्ध सारणी में कैद कर दिया। वहीं व्यवसायिकता की दौड़ में अंधे हो चुके शिक्षकों ने गुरू शिष्य पंरपरा का निर्वहन करने के बजाय इस रिश्ते को व्यवसायिक बना डाला और फिर शुरू हो गया पैसे से शिक्षा खरीदना और पैसे से शिक्षा देने का खेल। इतना ही नहीं शिक्षकों ने जहां शिक्षार्थियों को स्कूल में पढ़ाना बंद कर दिया वहीं उन्होंने अपनी कोचिंग क्लासेस शुरू कर दी। इस दौड़ में सरकारी स्कूलों के अध्यापक मात्र उपस्थिति पंजिका में अपने हस्ताक्षर करने ही स्कूल जाते हैं ताकि उन्हें महीने में सरकार द्वारा दी जा रही एक बंधी-बंधाई रकम मिल सके। इतना ही नहीं कई अध्यापकों ने तो ठेकेदारी प्रथा का अनुसरण करते हुए प्रशिक्षु अध्यापकों को अपने स्थान पर प्रतिनियुक्त कर दिया। इस अवैध प्रतिनियुक्ति की ऐवज में सरकारी स्कूलों के अध्यापक प्रशिक्षु अध्यापकों को महीने में चार-पांच हजार रूपये देते हैं।
सरकार का जन-जन तक शिक्षा पहुंचाने के नारे ने भी सरकारी स्कूलों में तैनात अध्यापकों को भ्रष्ट बना दिया है। मिड डे मील के नाम से सरकारी स्कूलों में आपूर्ति होने वाले राशन की खाई-बाड़ी में ये अध्यापक लग गए हैं। मिड डे मील योजना ने सरकारी स्कूलों में अध्ययन कर रहे छात्रों की संख्या में दोगुनी वृद्धि कर दी है। बेसिक शिक्षा में मिड डे मील का यह प्रचलन जहां छात्रों की संख्या को आंकड़ों की बाजीगरी और अध्यापकों को शिक्षा से विमुख कर रहा है। देखा जाए तो इस योजना से विद्यार्थियों के बजाए अध्यापकों की बल्ले-बल्ले कर दी है। रही-सही कसर सरकारों ने पूरी की है। अध्यापकों को अध्यापन कार्य में लगाने के बजाए कभी उन्हें मतदाताओं की संख्या की गणना में लगाया जाता है तो कभी जनगणना में इतना ही नहीं स्वास्थ्य विभाग के कई कार्यक्रमों में भी अध्यापकों का उपयोग किया जाता है। एक जानकारी के अनुसार यदि सालभर में एक अध्यापक द्वारा उसके विद्यालय में अध्यापन कार्य की गणना की जाए तो वह मात्र दो या तीन महीने ही बैठती है। ऐसे में राज्य में शिक्षा का स्तर क्या होगा यह आप स्वंय समझ सकते हैं।
प्रदेश के दूरस्थ गांवों में शिक्षा का स्तर कहां से सुधर पाएगा इससे शिक्षाविद चिंतित नजर आते हैं। उनका कहना है कि जब सुदूरवर्ती अंचलों में तैनात शिक्षक भोग विलासिता का जीवन यापन करने के लिए मैदानी क्षेत्रों की ओर अथवा सुविधाजनक स्थानों की ओर जाने की जुगत में लगा रहता है। इसके लिए वह एक मोटी रकम भी खर्च करने को तैयार है और तैयार हो भी क्यों नहीं जब शिक्षा का दायित्व देख रहे विभाग के मातहत अधिकारी और मंत्री तक उससे सुविधा शुल्क लेकर सुविधाजनक स्थान पर तैनाती का आश्वासन जो देते हैं। इस बात की बानगी तो यह है कि बीते शिक्षा सत्र में शिक्षा मंत्री द्वारा 429 अध्यापकों का स्थानान्तरण सुविधाजनक स्थानों पर कर दिया गया और वह भी सुविधा शुल्क लेकर। आनन-फानन में राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा इन सभी स्थानान्तरणों को रद्द कर इस पर जांच तो बैठाई ही गई है साथ ही शिक्षा मंत्री को भी अपने से हाथ ही नहीं धोना पड़ा बल्कि उसे इस विधानसभा चुनाव में टिकट से भी दूर रखा गया।
राज्य में शिक्षा के गिरते स्तर पर शिक्षाविद ही नहीं बल्कि ब्यूरोक्रेट भी चिंतित नजर आ रहे हैं। एक ब्यूरोक्रेट ने तो यहां तक कहा कि उसने राज्य की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए वह सबकुछ कर डाला जो उसने अपने सेवाकाल में सीखा था। यह अधिकारी आगामी चार-पांच महीनो बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसे में राज्य की शिक्षा व्यवस्था को कौन पटरी पर लाएगा यह यक्षप्रश्न आने वाली सरकार के सामने भी मुंह बाये खड़ा है।

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संभव है आज 27 रूपये 66 पैसे में दो जून की रोटी!

संभव है आज 27 रूपये 66 पैसे में दो जून की रोटी!
भ्रष्टाचार के समुद्र में डूबी कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयी व्यवस्था
भेड़-बकरियों की तरह एक कमरे में ठूंसी जा रही हैं छात्राएं
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 22 फरवरी। भेड़-बकरियों की तरह एक अदने से कमरे में सबको शिक्षा का नारा देने वाली भारत सरकार की कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका शिक्षा योजना उत्तराखण्ड में शिक्षाविदों को मुंह चिढ़ा रही है। प्रतिवर्ष करोड़ों रूपया समाज में शिक्षा से विमुख हो रहे ऐसी छात्राओं को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने पर खर्च किया जा रहा है, लेकिन भारत सरकार की यह योजना कितनी परवान चढ़ती है। इसकी बानगी उत्तराखण्ड में देखी जा सकती है। हम बात कर रहे हैं, सर्व शिक्षा अभियान कार्यक्रम के तहत उत्तराखण्ड में चलने वाले कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका शिक्षा विद्यालयों की। 27 रूपया 66 पैसे प्रतिदिन में क्या आज दो जून की रोटी, दो चाय और एक नाश्ता मयस्सर हो सकता है। आपका जवाब होगा नहीं, लेकिन उत्तराखण्ड में यह सब हो रहा है और यह सब कैसे चल रहा है यह भगवान ही जान सकता है।
20 रूपये किलो चावल, 18 रूपये किलो आटा और 6 रूपये कप चाय के जमाने में प्रदेश का शिक्षा विभाग छात्राओं की पेट की आग को 27 रूपये 66 पैसे प्रतिदिन में कैसे कैसे शांत कर रहा होगा यह तो वही बता सकते हैं, लेकिन इसमें कुछ गोलमाल जरूर है। या तो छात्राओं की संख्या हकीकत से कुछ ज्यादा सरकारी दस्तावेजों में दर्शायी जाती है या फिर कुछ और। 10 गुणा 12 के कमरे में 20-20 छात्राएं वह भी कुछ पलंग पर और कुछ पलंग के नीचे सुलाई जा रही है। यह बानगी तो प्रदेश के उत्तरकाशी जिले के मोरी कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की है। जहां न तो विद्यालय भवन है और ना ही किराए के भवन में समुचित व्यवस्था। रात को शराबी सड़के से सटे इस विद्यालय में धमाचौकड़ी भी मचा देते हैं। क्योंकि जहां यह विद्यालय बना है वहां किसी भी तरह की सुरक्षा व्यवस्था अथवा परिसर की सुरक्षा दीवार तक नहीं है ताकि असमाजिक तत्वों को विद्यालय में आने से रोका जा सके। ऊर्जा प्रदेश का दावा करने वाले उत्तराखण्ड के इस क्षेत्र में कभी-कभार ही बिजली देखने को मिलती है। ऐसे में इस विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रही छात्राएं कैसे शिक्षा प्राप्त कर रही होंगी यह आप स्वंय समझ सकते हैं। आठ से अट्ठारह वर्ष तक की बालिकाओं के लिए शौचालय तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। मुंह अंधेरे छात्राओं को नित्य कर्म के लिए खेतों की ओर रूखसत होना पड़ता है। यह बानगी तो केवल एक विद्यालय की है। इसी जिले के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय कण्डियाल गांव में 25 लाख रूपये खर्च होने के बावजूद भी बीते पांच सालों से निर्माणाधीन विद्यालय भवन पूरा नहीं हो पाया है। ठीक यही हाल केजीबीबी गंगनानी (बड़कोट), केजीबीबी धनपुर (उत्तरकाशी) जहां होटल के कुछ कमरों में यह विद्यालय चल रहा है। इनमें से ज्यादातर विद्यालय 20 हजार से 30 हजार रूपये प्रतिमाह किराए पर केजीबीबी विद्यालय चलाए जा रहे हैं, लेकिन छात्राओं को सुविधा के नाम पर झुनझुना ही दिखाया जाता है। ऐसे में शिक्षा की मुख्यधारा से अलग हुई छात्राएं शिक्षा के प्रति कैसे अपना रूझान बना पाएंगी यह तो प्रदेश का शिक्षा विभाग ही जाने।
चर्चा है कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत चलने वाले प्रदेश भर के लगभग 28 कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की शैक्षिक व्यवस्था ने इतना तो अवश्य कर दिया है कि जहां एक ओर इस शिक्षा नीति ने शिक्षा का उजाला उन अंधेरे इलाकों तक पहुंचाने का जिम्मा उठाया है जहां मीलों तक कोई विद्यालय नहीं है और यदि हैं भी तो वहां अध्यापक नहीं है वहीं इन विद्यालयों का जिम्मा उठा रहे अधिकारियों द्वारा इन पोषित विद्यालयों को सरकार द्वारा दिए जाने वाले बड़े बजट के बडे हिस्से को डकारने के मामले में उनको उतना ही बड़ा कमीशनखोर बना दिया है। चाहे छात्राओं का खाने-पहनने की व्यवस्था हो या रहने-सोने की व्यवस्था। एक जानकारी के अनुसार बिना कमीशन लिए यहां कोई भी बिल पास करवाना संभव नहीं हो पाता। चर्चाओं के अनुसार इन विद्यालयों में तैनात वार्डन व स्टॉफ हमेशा भयातुर रहता है कि ना जाने कब कौन सा तुगलकी फरमान उनके अधिकारियों द्वारा जारी कर दिया जाएगा।
गौरतलब हो कि इन विद्यालयों की स्थापना उन बच्चों के लिए की गई थी जो दलित शोषित और शिक्षा से कोसों दूर रहकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं और शिक्षा की मुख्यधारा से काफी दूर थे। इन विद्यालयों में पढ़ने वाली छात्राएं आज 20 से 40 किमी. की पैदल दूरी तय कर शिक्षा का ज्ञान लेने इन विद्यालयों में पहुंचती हैं। वहीं छुट्टियों से पूर्व में अपने अभिभावकों के साथ वापस लौटने के लिए सुबह से शाम तक मिलों पैदल चलने वाली इन छात्राएं केे अभिभावकों को विद्यालय परिसर में ठहरने तक की जगह नहीं मिल पाती। इन गरीब और शोषित अभिभावकों को रात आसरे के लिए जगह-जगह भटकना पड़ता है। यही नहीं पुख्ता सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उत्तरकाशी जनपद में चारों कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों को संचालित करने वाले सर्व शिक्षा अभियान के जिलों में तैनात अधिकारी इन विद्यालयों में तैनात संचालिकाओं को अपनी अंगुलियों पर नचाते फिरते हैं। यही हाल प्रदेश के अधिकतर कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों का है। यहां कब विभागीय अधिकारी क्या फरमान जारी कर दें, कहा नहीं जा सकता।
नियमानुसार इन विद्यालयों में तैनात महिला कर्मचारियों को निर्देश हैं कि वे विद्यालय परिसर में अपने परिवार के साथ भी नहीं रह सकते और न ही किसी को सांय चार बजे बाद विद्यालय परिसर में प्रवेश की अनुमति है। चर्चाओं के अनुसार सर्व शिक्षा अभियान के तहत इन विद्यालयों का जिम्मा देख रहे मातहत अधिकारी अकसर सांय चार बजे बाद ही इन विद्यालयों की ओर शराब पीकर रूख करते हैं, जिससे इन विद्यालयों के संचालकों के सामने समस्या पैदा हो जाती है कि वे अपने अधिकारियों की जी हुजूरी करें अथवा नियमों का पालन।
करोड़ों रूपये सर्व शिक्षा अभियान पर व्यय कर रही भारत सरकार प्रतिमाह किराए के रूप में 20 से 50 हजार रूपये प्रति विद्यालय देने से भी गुरेज नहीं कर रही है। वहीं लाखों रूपये खर्च करने के बाद भी आधे-अधूरे पड़े निर्माणाधीन विद्यालय अब जर्जर होकर दोबारा टूटने के कगार पर है। सूत्रों ने तो यहां तक बताया है कि विभागीय अधिकारियों की स्थानीय भवन स्वामियों से मिली भगत के कारण विभागीय भवनों का निर्माण पूरा नहीं कराया जा रहा है। क्योंकि विभागीय अधिकारियों को भवन स्वामियों से किराए के रूप में हजारों रूपये प्रतिमाह कमीशन मिल रही है। ऐसे में ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगना लाजमी है। कमोबेश यही हाल प्रदेश में संचालित हो रहे 28 केजीबीबी के भी हैं। एक जानकारी के अनुसार राज्यभर में कहीं भी विद्यालय के लिए भवन नहीं है और संचालित किए जा रहे विद्यालय बदहाली की स्थिति में है। इस विषय पर जब सर्व शिक्षा अभियान से जुड़े अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई तो कई अधिकारियों के फोन बंद मिले और जिनके फोन मिले भी उन्होंने इस विषय पर बोलने से मना कर दिया।

 

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दावा सशक्त लोकपाल बिल का, कार्यालय के लिए मिली जमीन भी छीनी

अपनी ही सरकार के आदेशों को पलटते मुख्यमंत्री
राजेन्द्र जोशी
सशक्त लोकपाल बिल बनाने का दावा करने वाली खण्डूडी सरकार के प्रदेश उत्तराखण्ड में लोकायुक्त हेतु कार्यालय भवन के लिए ही जमीन मयस्सर नहीं है। इतना ही नहीं जिस जमीन को पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने लोकायुक्त को आवंटित की थी, खण्डूडी ने उस जमीन को ठीक चुनाव के बाद सतर्कता विभाग को हस्तांतरित करने का शासनादेश जारी कर दिया।
मुख्यमंत्री खण्डूडी सशक्त लोकपाल के लिए कितने ही ढोल क्यों न पीटें लेकिन उनकी कार्यशैली से यह साफ हो गया है कि वह कितने सशक्त लोकपाल के पैरोकार हैं। इतना ही नहीं खण्डूडी इस आदेश से यह भी साफ हो गया है कि वह अपनी ही सरकार के आदेश पलटने में कोताही नहीं बरतने वाले। मामला राज्य में स्थापित कार्यालय की भूमि को लेकर है। पूर्ववर्ती निशंक सरकार ने लोकायुक्त कार्यालय हेतु शासना देश संख्या 554/2010 दिनांक 4 मार्च 2011 द्वारा ग्राम लाडपुर परगना तहसील व जिला देहरादून में लोकायुक्त कार्यालय के लिए आवंटित जमीन हेतु शासनादेश को निरस्त करते हुए नए शासनादेश संख्या 260/ वित्त अनुभाग-3/2002 दिनांक 15/02/02 में निहित प्रावधानों एवं आपके द्वारा संस्तुत अनुमोदित खाता संख्या 274 के खसरा संख्या 44 ´ में अंकित एक हैक्टेयर भूमि को निन्म शर्तों और प्रतिबंधों के अनुसार सतर्कता विभाग उत्तराखण्ड को हस्तांतरित कर दी गई है।
मामले पर जब लोकायुक्त जस्टिस एम.एम. घिल्डियाल से जानकारी ली गई तो उन्होंने इस मामले पर अनभिज्ञता जाहिर की और बताया कि उन्हें यह बताया गया कि उक्त भूमि में कुछ कानूनी अड़चने हैं। जब उनसे यह पूछा गया कि यह भूमि सतर्कता विभाग को कैसे आवंटित हो गई तो उन्होंने कहा यह राज्य सरकार का मामला है।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है सरकार के आदेश को परिवर्तित करने का काम नई सरकार के गठन के बाद होता हुआ तो जरूर देखा होगा लेकिन मौजूदा भाजपा सरकार अपने ही शासन मे हुए आदेशो को ही पलटती हुई देखी जा रही है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा सरकार के भीतर किस तरह का शीतयुद्व लगातार जारी है। ऐसा नही है कि भाजपा के सभी बड़े नेता एकजुट होकर विकास की बात करते हो जबकि भाजपा हाइकमान कई बार भाजपा के उत्तराखण्ड नेताओ को एकजुट रहते हुए विकास पर ध्यान देने की नसीहत दे चुका है। लेकिन इसके बाद भी भाजपा सरकार हाइकमान के आदेशों पर कोई ध्यान नही दे रही। विधानसभा चुनाव का मतदान निपट जाने के बाद चुनाव परिणाम आने से पहले जिस तरह भाजपा के भीतर भीरतघात किए जाने की बातो को लेकर भाजपा हाईकमान के दरबार में उत्त्राखण्ड के नेताओ ने दस्तक दी वह निश्चित रूप से एक दुसरे को नीचा दिखाने के सिवा और कुछ नही थी। उत्तराखण्ड में 2012 के विधानसभा चुनाव में पूरी भाजपा को दांव पर लगाकर जिस तरह खंडूरी है जरूरी का नारा जनता के बीच प्रस्तुत किया गया इसका क्या परिणाम रहेगा यह तो 6 मार्च को मतगणना के बाद तय हो जाएगा लेकिन इस नारे ने उत्त्राखण्ड की भाजपा को एकजुट करने के बजाए बिखराव की ओर बड़ा दिया। राजनैतिक लड़ाई सभी दलो में लगातार सामने आती रहती है लेकिन यदि मौजूदा सरकार के शासनकाल में ही पुराने आदेशों को पलटने का खेल खेला जाना शुरू हो जाए तो यह सरकार के लिए बेहद सोचनीय विषय बन जाता है। वहीं चर्चाओं के अनुसार आजकल राज्य सरकार द्वारा आचार संहिता के कारण बाधित हुए कई कार्याें को पिछले दरवाजे से बखूबी किया जा रहा है। इन कामों को इतनी जल्दी में क्यों अंजाम तक पहुंचाया जा रहा है। इसके पीछे राजनैतिक विश्लेषकों का तर्क है कि भाजपा के मुख्यमंत्री को अब उम्मीद नहीं है कि उनकी सरकार आने वाली है, लिहाजा वे इन कामों को अंजाम देने में जुटे हुए हैं।
इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्तमान भाजपा सरकार के भीतर शीतयुद्व काफी तेज गति से चल रहा है। इस तरह के आरोप कांग्रेस भाजपा पर लगाती हुई नजर आती थी लेकिन मौजूदा खंडूरी सरकार ने जिस तरह आदेशो को पलटना शुरू किया है अब कांग्रेस को इस तरह के आरोप लगाने की जरूरत नही आती हुई देखी जा रही यह काम खुद सत्ता में बैठी खंडूरी सरकार करती हुई नजर आ रही है। ऐसे में पुनः सत्ता वापसी का सब्जबाग देखना कहां तक सफल होगा इसका आंकलन खुद ही किया जा सकता है। एक तरफ भाजपा उत्त्राखण्ड में खण्डूडी के नेतृत्व में चुनाव लड़कर पूरी भाजपा को दांव पर लगा बैठा है वही दूसरी तरफ इस तरह के आदेश भाजपा के भीतर ही कई तरह के विवादो को जन्म भी देते हुए नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर सरकार के बाहर मतभेदो की लड़ाई चलने की बातें जो साबित नही हो पाती थी वह खंडूरी के शासनकाल में इसा शासनादेश को पलट देने से साबित हो जाती है कि मौजूदा समय में भी खंडूरी निशंक के कार्यकाल में हुए शासनादेश को पलटने का खेल खेलने में लगे हैं।

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सीएम पद को लेकर सांसदों पर कांग्रेस नहीं खेलेगी दांव

डिप्टी सीएम के मूड में नहीं भाजपा व कांग्रेस आलाकमान।
राजेन्द्र जोशी
उत्तराखण्ड की तीसरी निर्वाचित होने जा रही सरकार को लेकर और मुख्यमंत्री पद के लिए लॉबिंग तेज हो गई है। सत्ताधारी दल डिनर डिप्लोमेसी के सहारे निर्दलीय विधायकों के साथ साथ सत्ताधारी दल व विपक्ष के बागी विधायकों को भी अपने पाले में मिलाने का खेल शुरू हो गया है हालांकिं उत्त्राखण्ड में भाजपा के सत्ता वापसी के संकेत बेहद कम नजर आ रहे हैं लेकिन इसके बाद भी भाजपा सत्ता में वासपी के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती इसी के चलते डीनर डिप्लोमेसी का खेल शुरू हो चुका है। सूत्रों की मानें तो सत्ताधारी दल के आला लेता ऐसे कुछ बागियों को बीते दो दिन पूर्व एक डीनर भी दे चुके हैं, ताकि ये बागी सरकार बनाने के लिए आवश्यक गणित जुटा सकें।
छह मार्च को भले ही प्रदेश के सीएम खंडूरी राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप देंगे और इसी दिन प्रदेश की राज्यपाल सबसे बड़े राजनैतिक दल को सरकार बनाने के लिए बुलाएंगी। वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की लहर के कारण कांग्रेस सबसे बड़े राजनैतिक दल के रूप में उभर कर सामने आती हुई देखी जा रही है और इसी राजनैतिक दल के साथ निर्दलीय विधायक भी अपना समर्थन देते हुए नजर आयेंगे। क्योकि सरकार बनाने के लिए किसी भी राजनैतिक दल को बहुमत के आधार पर 36 सीटें विधानसभा में चाहिए होंगी। 2007 की निर्वाचित सरकार को सरकार बनाने के लिए जनता ने 35 सीटें विधानसभा की दी थी और एक निर्दलीय विधायक राजेन्द्र सिंह भण्डारी के समर्थन दे देने के बाद प्रदेश मे ंभाजपा की सरकार बन गई थी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां परिसीमन के आधार पर बदल गई हैं जिस कारण राजनीतिक विश्लेषक उत्त्राखण्ड में कांग्रेस को 32 से 37 सीटांे के साथ सबसे बड़े राजनैतिक दल के रूप आता बता रहे हैं।  इसके अलावा राजनैतिक विश्लेषको का मानना है कि भाजपा 22 से 25 सीटों को लेकर दूसरा राजनैतिक दल बनकर उभरेगा और विपक्ष में बैठने के लिए भाजपा को मजबूर होना पड़ेगा लेकिन विपक्ष में बैठने के लिए नेता प्रतिपक्ष को लेकर अभी से ही भाजपा के भीतर घमासान तेज हो गया है और भाजपा संगठन के साथ साथ हाइकमान भी उत्तराखण्ड के नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर भाजपा दिग्गजों पर अपनी नजर बनाने में जुट गया है। सत्ता में कांग्रेस की वापसी को लेकर अधिकारी वर्ग के साथ साथ कर्मचारियो में भी कयास तेज हो गए हैं और वर्तमान में प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी परिवर्तन के कारण अभी से कमर कसती हुई नजर आ रही हैै। 5 साल तक भाजपा शासन में तवज्जो ना मिल पाने के कारण अब ऐसे अधिकारी कांग्रेस के संपर्क में आते हुए देखे जा रहे हैं जिनका वजन नई सरकार के बाद बढ़ना तय है। हालाकि 6 मार्च को उत्त्राखण्ड की तीसरी निर्वाचित सरकार का फैसला जनता के सामने प्रस्तुत हो जाएगा और इसके बाद मुख्यमंत्री को लेकर तस्वीर भी साफ हो जाएगी। उत्त्राखण्ड मे कांग्रेस वर्तमान परिस्थितियो के अनुसार सरकार बनाती हुई देखी जा रही है राज्य की 12 एससीएसटी विधानसभा सीटों को लेकर कांग्रेस का ग्राफ इन सीटों पर सबसे अधिक नजर आता हुआ बताया जा रहा ळै। 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पास महज दो विधानसभा की सीटों के साथ अपना वजन था लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 12 विधानसभा सीटो में से कांग्रेस को 10 सीटो पर जीत का सेहरा बंधता हुआ देखा जा रहा है । राजनैतिक विश्लेषको के अनुसार प्रदेश में कांग्रेस बसपा के ग्राफ को दलित कार्ड के सहारे ही रोकने में कामयाब हो सकती है और यदि 2012 के विधानसभा चुनाव परिणाम में कांग्रेस को उत्त्राखण्ड की एससीएसटी की 10 सीटें मिलती है तो यह कांग्रेस के लिए उत्त्राखण्ड में बेहद मजबूत नींव होगी। 2007 के अनुसार उत्तराखण्ड में कांग्रेस के पास महज जहां दो सीटे थी।
वर्तमान में केन्द्र में बैठी कांग्रेस सरकार उत्तराखण्ड में एम पी को लेकर कोई छेड़छाड़ करने के मूड में नजर नही आ रही क्योकि कांग्रेस के पास वर्तमान में बैसाखियो के सहारे केन्द्र सरकार चलाने की मजबूरी है और ऐसे में उत्त्राखण्ड के मुख्यमंत्री को लेकर कांग्रेस किसी भी एमपी पर दांव कतई नहीं खेलेगी जिससे साफ हो जाता है कि कांग्रेस जीते हुए विधायकों मे से ही प्रदेश का मुख्यमंत्री चुनती हुई नजर आयेगी। ऐसे में लाटरी किसकी खुलेगी यह अभी भविष्य के गर्भ में है। वहीं राजनैतिक विश्लेषक भी मानते है कि उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री को लेकर कांग्रेस प्रदेश के पांचो सांसदो में से किसी को भी इस पद पर बैठाने का जोखिम नही लेगी क्योकि किसी भी सांसद को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने के बाद कांग्रेस को दो चुनाव करवाने पड़ेगे और 2014 को लेकर कांग्रेस बेहद गम्भीर नजर आ रही है। इसके अलावा उधमसिंह नगर से कांग्रेस के उपनेता तिलकराज बेहड़ तथा हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक ने भी तराई सेडिप्टी सीएम बनाए जाने की मांग भी जिस तरह से उठाई है उसे लेकर कांग्रेस के साथ ही भाजपा हाइकमान बेहद गम्भीर नजर आ रहा है और माना जा रहा हैै कि उत्तराखण्ड में इस तरह की बातों को कांग्रेस किसी भी कीमत पर दबाव के चलते पूरा करने के मूड में नजर नही आ रही। उत्तराखण्ड में वर्तमान में निर्दलीय विधायकांे पर भी लगातार राजनैतिक दलो की निगाहें लगी हुई है।

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कांग्रेस में सीएम को लेकर लॉबिंग शुरू

राजेन्द्र जोशी
देहरादून। नई सरकार के गठन को लेकर उत्तराखण्ड में राजनीति तेज हो गईहै। दोनेा ही दलो में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर लॉबिंग का खेल
खेला जाना शुरू हो गया है लेकिन सत्ता परिवर्तन की लहर को भांपकर चलरही भाजपा की सम्भावनाएं सत्ता की देहलीज पर पहुच पाने की बेहद कम है लेकिन इसके बाद भी सत्ता हासिल करने के लिए जोड़तोड़ की राजनीति के साथ साथ निर्दलीय विधायको पर भाजपा की नजर बनी हुई है और माना जा रहा है कांग्रेस को यदि पूर्ण बहुमत उत्तराखण्ड मे ंनही मिलता तो भाजपा बैसाखियो के सहारे सत्ता की देहलीज पर पहुचेगी। उत्तराखण्ड में 30 जनवरी को विधानसभा चुनाव 2012 के लिए 70 सीटो पर मतदान हुआ था और इसका परिणाम 6 मार्च को आना है लेकिन अभी से ही मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर जिस तरह से लॉबिंग शुरू हुई है उसमें कांग्रेस भी पीछे नही हैं।
लॉबिंग का खेल भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के भीतर घमासान मचा रहा है और मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर कांग्रेस के कई गुट अभी से ही तैयारियो में जुट गए है।दिल्ली दरबार के साथ साथ उत्त्राखण्ड के बड़े नेता जो मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं उन्होने वहां की परिक्रमा करनी शुरू कर दी है। इसलिए माना जा रहा है कि पुर्ण बहुमत आने के
बाद कांग्रेस उत्त्राखण्ड में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ब्राहमण या फिर दलित कार्ड को खेल सकती है क्योकि माना जा रहा है कि कई नेता अपनी विधानसभाओ में अपनी राजनैतिक जमीन बचाने में कामयाब तो रहेंगे लेकिन वोट प्रतिशत ना बड़ा पाना उनकी नाकामयाबी रहेगी जिस कारण उनका सीएम की कुर्सी पर बैठना मुश्किल सा लग रहा है। 2007 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से बेदखल होने के बाद जनता ने भाजपा को सत्ता में प्रवेश करा दिया था और उसके बाद से भाजपा में लगातार अन्तर्विरोध के साथ साथ नेतृत्व
परिवर्तन के कारण भाजपा पुरी तरह बिखर गई थी जिसका फायदा 2009 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा नही उठा पाई थी और उस समय मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे बीसी खंडूरी को लोकसभा की पांचो सीटे कांग्रेस की झोली में देने का इनाम भाजपा हाइकमान ने सीएम की कुर्सी से हटाकर दिया था लेकिन 11 सितम्बर को भाजपा ने फिर से खंडूरी को उत्तराखण्ड का सीएम बनाकर नेतृत्व परिवर्तन कर दिया और 2012 के विधानसभा चुनाव में भी खंडूरी को ही जरूरी बताकर प्रदेश भर में पुनः सत्ता में आने का ढोल
पीटा गया। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां बता रही है कि उत्तराखण्ड में भाजपा सत्ता की देहलीज पर नही पुहच पा रही है। वही खंडूरी जरूरी के नारे ने भी कोश्यारी खेमे में तूफान खड़ा कर दिया और यह नारा कुमाउ में पुरी तरह नाकामयाब साबित हुआ वहीं पूर्व सीएम निशंकने अपनी विधानसभा में भीतरघात किए जाने की बाते भी भाजपा हाइकमान को बताई हैं जिससे साबित हो गया है कि निशंक को हराने के लिए खंडूरी खेमे के साथ साथ कोश्यारी खेमे ने भी कोई कसर नही छोड़ी। अब चुनाव परिणाम से पहले ही भाजपा में बगावत किए जाने की आग सुलग पड़ी है लेकिन विधानसभा चुनाव में कोश्यारी खेमें ंके जो लोग खंडूरी को जरूरी बता रहे थे अब वह मौनी बाबा की भूमिका में नजर आ रहे है इसके अलावा संगठन के प्रदेश अध्यक्ष ने भी चुनाव में भीतरघात किए जाने का आरोप लगाया है। कुल मिलाकर खंडूरी जरूरी का नारा देने वाले लोग अब पाला बदलने में जुट गए हैं क्योकि इस चुनाव मे यदि बीसी खुडूरी कोटद्वार से चुनाव हारते है तो यह भाजपा के लिए  बेहद शर्मनाक बात होगी और खंडूरी की राजनैतिक जमीन का भी अंत हो जाएगा।

राजनैतिक विश्लेशको का कहना है कि यदि खंडुरी कोटद्वार से चुनाव जीत भी जाते है तो जीत का अंतर तय करेगा कि खंडूरी का वजन कोटद्वार में कितना भारी था। कुल
मिलाकर खंडूरी को जरूरी बताने वाले लोगो के मौनी बाबा की भूमिका में आ जाने से पूरा मामला बेहद गम्भीर नजर आ रहा है।

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पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूडी का सम्मान समारोह प्रायोजित अथवा राजनैतिक!

सम्मान समारोह प्रायोजित अथवा राजनैतिक!
राजेन्द्र जोशी
पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूडी को लगभग 10 सालों बाद सड़कों के पुर्ननिर्माण को लेकर पुरस्कृत किया जाना पूरी तरह से राजनैतिक व प्रायोजित लगता है। जनरल खण्डूडी राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व काल में कार्य कर चुके हैं। इतने वर्षों बाद सड़क निर्माण के लिए खण्डूडी को सम्मानित किए जाने पर राजनैतिक हलकों में यह मामला खासा चर्चा का विषय बन गया है। इनका कहना है कि आिखर पुरस्कृत करने वाले और पुरस्कृत होने वाले इतने सालों तक कहां सोऐ रहे। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण सड़कों से नहीं बल्कि चारित्रिक उत्थान एवं सांस्कृतिक पुर्नजागरण से होता है और पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में यह दोनो चीजें ही गायब रही। विश्लेषकों का कहना है कि जहां तक चारित्रिक उत्थान का सवाल है पूर्व मुख्यमंत्री के शासन काल में भ्रष्टाचार चरम पर था और मुख्यमंत्री के नाक के नीचें उनका लाडला सारंगी व उसकी फौज जमकर लूट मचा रही थी और जहां तक चारित्रित उत्थान का सवाल है तो पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री खण्डूडी के शासनकाल में एक ईमानदार अधिकारी सत्येंद्र दूबे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। जबकि एक जानकारी के अनुसार सत्येंद्र दूबे ने भूतल परिवहन मंत्रालय को माफियाओं से अपनी जान का खतरा बताते हुए पहले ही आगाह कर दिया था, लेकिन भूतल मंत्रालय ने उनके इस पत्र को रद्दी के टोकरी में डाल दिया। इसका यह परिणाम हुआ कि सत्येंद्र दूबे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश की राजनीति में लगभग हासिये पर खिसक चुके पूर्व मुख्यमंत्री खण्डूडी इस तरह के प्रायोजित पुरस्कारों से प्रदेश की राजनीति कि मुख्यधारा में नहीं आ सकते। इसके लिए उन्हें पदलोलुपता को तिलांजलि देते हुए सामाजिक पुर्ननिर्माण के लिए निस्वार्थ भाग से काम करना होगा। विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह योजना आयोग के उपाध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी ने बीते दिनों यह घोषणा की कि अब 70 वर्ष के बाद वे सक्रिय राजनीति से सन्यास लेंगे और पार्टी को बुजुर्ग की हैसियत से सलाह देते रहेंगे। उनका यह भी कहना है कि प्रदेश की राजनीति में अब युवाओं को अवसर दिए जाने चाहिए। ताकि ऊर्जावान लोग राजनीति में आए। प्रदेश के लोगों ने उनकी इस घोषणा को प्रदेश की राजनीति में सक्रिय लोगों ने हाथों हाथ लिया है और इसे पार्टी के लिए सकारात्मक कदम भी बताया। राजनैनिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश की जनता के खण्डूडी को बहुत ऊंचे मुकाम तक पहुंचाया और उन्हें भी जनभावनाओं का आदर करते हुए और अपने वरिष्ठ नेता मनोहर कांत ध्यानी के सिद्धांतों पर अमल करते हुए प्रदेश की सियासत में युवाओं को आगे आने का रास्ता देना चाहिए और ये पुरस्कारों के प्रायोजित समारोह का लोभ सवंरण करना चाहिए।
बहरहाल खण्डूडी को 10 साल बाद मिलें पुरस्कार से राजनैतिक नफानुकसान हुआ हो या नहीं लेकिन इस कार्यक्रम ने राजनैतिक हलकों में पूर्व मुख्यमंत्री को कोई खासा लाभ नहीं दिखाई दे रहा है।

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निशंक के बढ़ते जनाधार से परेशान हैं मुख्यमंत्री पद के दावेदार

अपने ही डुबोने पर लगे हैं भाजपा की नाव
निशंक के बढ़ते जनाधार से परेशान हैं मुख्यमंत्री पद के दावेदार
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 28 अप्रैल। भारतीय जनता पार्टी मिशन 2012 को लेकर लगातार अपना अभियान चलाए हुए है। मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के ताबडतोड़ दौरों ने भाजपा के जनाधार में जहां अप्रत्याशित वृद्धि कर दी है वहीं भाजपा के ही कुछ नेता हैं कि वे अपनी ही पार्टी के किए धरे पर पलीता लगाने पर लगे हैं।
उल्लेखनीय है कि मेजर जनरल भुवन चंद खण्डूडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश का परिणाम पांचों लोकसभा सीट पर पार्टी को मिली करारी शिकस्त के रूप में प्रदेश की जनता दे चुकी थी और प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल भाजपा आलाकमान भी भांप चुका था। यही कारण है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी से खण्डूडी को हटाया गया और ताजपोशी की गई एक युवा नेता निशंक की। कुछ दिन तो भाजपा के वे नेता मुख्यमंत्री के सुर में सुर मिलाते रहे लेकिन बाद में इन नेताओं को लगने लगा कि यदि निशंक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी पकड़ मजबूत कर दिए तो इनका राजनैतिक भविष्य चौपट हो जाएगा। सो ये नेता अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की कुर्सी के पायों को खींचने पर लग गए। इन्हें निशंक के हर कार्य बुरे लगने लगे और विपक्ष तो कम भाजपा के ये नेता निशंक के खिलाफ प्रदेश से लेकर केंद्र तक माहौल बनाने में जुट गए। लेकिन निशंक के कार्याें ने केंद्रीय आलाकमान को जहां संतुष्ट किया वहीं निशंक के कार्यों से प्रदेश की जनता में भी भाजपा के पक्ष में कम होता जनाधार भी बढ़ता गया। आज स्थिति खण्डूडी के शासनकाल से उलट है। प्रदेश में मुख्यमंत्री के ताबडतोड़ दौरों ने भाजपा के जनाधार में अप्रत्याशित वृद्धि की हैै। यह वृद्धि अचानक ऐसे ही नहीं हुई इसके पीछे डा. निशंक की कुशल कार्य क्षमता और जनता में उनकी पैठ प्रमुख रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि डा. निशंक ने 20 फरवरी के बाद प्रदेश में भाजपा के पक्ष में वह माहौल खडा कर दिया है जो कोई नेता नहीं कर सकता। प्रदेश का मुखिया राज्य बनने के बाद ऐसे-ऐसे दूर-दराज के गांवों तक पहुंचा जहां वर्तमान उत्तराखण्ड के नेता तो क्या आजादी के बाद से बने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश के नेता तक नहीं पहुंचे थे। मुख्यमंत्री निशंक ने इन दूर-दराज के गांवों के लोगों की सुध ही नहीं ली बल्कि उनकी समस्याओं को आत्मसात भी किया और दौरे से लौटने के बाद देहरादून पहुंचने पर ग्रामीणों द्वारा दिए गए पत्रों पर शासन को तुरंत कार्यवाही के निर्देश भी दिए। इससे ग्रामीणों में भाजपा सरकार के प्रति अपनापन तो पैदा हुआ ही साथ ही ग्रामीणों को यह लगने लगा है कि भाजपा सरकार उनकी खैरख्वाह है।
प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक वातावरण को यदि देखा जाए तो भाजपा के ही नेता अपनी ही सरकार के कार्यों से संतुष्ट नहीं है और वे मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा माहौल खड़ा करने की कोशिश में लगे हुए हैं जिससे पार्टी को खासी हानि उठानी पड़ सकती है। विपक्ष तो सत्ता के कार्याें को कभी भी जायत नहीं ठहराता यहां तो सत्ता पक्ष ही विपक्ष बना हुआ है।

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भाजपा की नाव निशंक के बढ़ते जनाधार से परेशान हैं मुख्यमंत्री पद के दावेदार

अपने ही डुबोने पर लगे हैं भाजपा की नाव

निशंक के बढ़ते जनाधार से परेशान हैं मुख्यमंत्री पद के दावेदार

राजेन्द्र जोशी

देहरादून, 28 अप्रैल। भारतीय जनता पार्टी मिशन 2012 को लेकर लगातार अपना अभियान चलाए हुए है। मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के ताबडतोड़ दौरों ने भाजपा के जनाधार में जहां अप्रत्याशित वृद्धि कर दी है वहीं भाजपा के ही कुछ नेता हैं कि वे अपनी ही पार्टी के किए धरे पर पलीता लगाने पर लगे हैं। उल्लेखनीय है कि मेजर जनरल भुवन चंद खण्डूडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश का परिणाम पांचों लोकसभा सीट पर पार्टी को मिली करारी शिकस्त के रूप में प्रदेश की जनता दे चुकी थी और प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल भाजपा आलाकमान भी भांप चुका था। यही कारण है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी से खण्डूडी को हटाया गया और ताजपोशी की गई एक युवा नेता निशंक की। कुछ दिन तो भाजपा के वे नेता मुख्यमंत्री के सुर में सुर मिलाते रहे लेकिन बाद में इन नेताओं को लगने लगा कि यदि निशंक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी पकड़ मजबूत कर दिए तो इनका राजनैतिक भविष्य चौपट हो जाएगा। सो ये नेता अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की कुर्सी के पायों को खींचने पर लग गए। इन्हें निशंक के हर कार्य बुरे लगने लगे और विपक्ष तो कम भाजपा के ये नेता निशंक के खिलाफ प्रदेश से लेकर केंद्र तक माहौल बनाने में जुट गए। लेकिन निशंक के कार्याें ने केंद्रीय आलाकमान को जहां संतुष्ट किया वहीं निशंक के कार्यों से प्रदेश की जनता में भी भाजपा के पक्ष में कम होता जनाधार भी बढ़ता गया। आज स्थिति खण्डूडी के शासनकाल से उलट है। प्रदेश में मुख्यमंत्री के ताबडतोड़ दौरों ने भाजपा के जनाधार में अप्रत्याशित वृद्धि की हैै। यह वृद्धि अचानक ऐसे ही नहीं हुई इसके पीछे डा. निशंक की कुशल कार्य क्षमता और जनता में उनकी पैठ प्रमुख रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि डा. निशंक ने 20 फरवरी के बाद प्रदेश में भाजपा के पक्ष में वह माहौल खडा कर दिया है जो कोई नेता नहीं कर सकता। प्रदेश का मुखिया राज्य बनने के बाद ऐसे-ऐसे दूर-दराज के गांवों तक पहुंचा जहां वर्तमान उत्तराखण्ड के नेता तो क्या आजादी के बाद से बने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश के नेता तक नहीं पहुंचे थे। मुख्यमंत्री निशंक ने इन दूर-दराज के गांवों के लोगों की सुध ही नहीं ली बल्कि उनकी समस्याओं को आत्मसात भी किया और दौरे से लौटने के बाद देहरादून पहुंचने पर ग्रामीणों द्वारा दिए गए पत्रों पर शासन को तुरंत कार्यवाही के निर्देश भी दिए। इससे ग्रामीणों में भाजपा सरकार के प्रति अपनापन तो पैदा हुआ ही साथ ही ग्रामीणों को यह लगने लगा है कि भाजपा सरकार उनकी खैरख्वाह है। प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक वातावरण को यदि देखा जाए तो भाजपा के ही नेता अपनी ही सरकार के कार्यों से संतुष्ट नहीं है और वे मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा माहौल खड़ा करने की कोशिश में लगे हुए हैं जिससे पार्टी को खासी हानि उठानी पड़ सकती है। विपक्ष तो सत्ता के कार्याें को कभी भी जायत नहीं ठहराता यहां तो सत्ता पक्ष ही विपक्ष बना हुआ है।

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नेपथ्य की ओर जा रहे दल में जान फूंकने की कवायद

राजेन्द्र जोशी

उत्तराखण्ड क्रंाति दल आजकल राजनीतिक गतिविधियो के चलते सुर्खियो मे है। दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पवंार जहा एक ओर अनुशासन का डंडा चलाते हुए नैपथ्य की ओर जा रहे दल को उत्तराखण्ड की राजनीति की मुख्य धारा मे लाने के लिए प्रयासरत है तो वही दूसरी ओर सत्ता की मलाई चाट रहे कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट है कि पार्टी से निकाल बाहर किए जाने के बाद भी यू.के.डी को तोडने पर जुटे है।
यहंा यह भी उल्लेखनीय है कि पहले काग्रेंस और अब भाजपा के साथ पींगे बढाने वाली यू.के.डी को चुनाव के नजदीक आते ही अपने अस्तित्व की याद आने लगती है। दल के नेताओ को सत्ता के साथ मलाई चटकाने की आदत पड चुकी है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव से ऐन पहले यह दल सत्ता से विमुख होकर अपनी ढपली अलग ही बजाना शुरू कर देते है। और चुनाव के बाद दो चार सीटे लाने पर यह राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के हमराही बन जाते है। वही दूसरी ओर यू.के.डी को राज्य आंदोलनकारी दल के रूप मे प्रदेश भर मे राज्य बनने के बाद अपार जन समर्थन मिला था। लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के साथ गलबहिया करते हुए यह दल राज्यवासियो के जेहन मे वह मुकाम नही बना पाई जिसकी कि  राज्यवासियो ने कल्पना की थी। क्षेत्रीय दल होने के कारण राज्यवासियो ने इस दल के प्रति अपनापन तो था ही साथ ही इस दल से यह उम्मीद भी थी कि यह दल राज्यवासियो के राज्य निर्माण के उदेदश्य को पूरा करेगा। लेकिन यह दल राज्यवासियो के मंसूबो पर खरा तो नही उतर पाया लेकिन इसके नेता जरूर अपने मंसूबो को मुकाम तक पहुचाने मे कामयाब रहे। इसका यह परिणाम हुआ कि राज्य निर्माण के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव मे इस दल को चार सीटे मिली थी और इसके  बाद हुए 2007 के चुनाव मे यह तीन सीटो पर आकर सिमट गई।
दल के अध्यक्ष बनने के बाद त्रिवेन्द्र पंवार ने दल को शक्ति के रूप् मे स्थापित करने के उदेदश्य से भाजपा सरकार से समर्थन वापस लेकर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की शुरूआत की। इसी क्रम मे उन्होने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करते हुए दल के सभी नेताओ से इस्तीफा देने की गुजारिश की। लेकिन सत्ता की मलाई चाट रहे चंद नेताओ को उनका यह फैसला रास नही आया और वे दल से बगावत कर गए। इस बगावत का यह परिणाम हुआ कि संगठन ने कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट को तो निष्कासित कर दिया और 12 अन्य भट्ट के हमराहियो को तीन दिन मे जवाब देने को कहा गया है कि वे अपना स्पष्टिकरण पार्टी को दे कि वे क्यों भट्ट के साथ राजभवन गए।
नेपथ्य की ओर जा रहे दल में जान फूंकने की कवायद
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 5 जनवरी। उत्तराखण्ड क्रंाति दल आजकल राजनीतिक गतिविधियो के चलते सुर्खियो मे है। दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पवंार जहा एक ओर अनुशासन का डंडा चलाते हुए नैपथ्य की ओर जा रहे दल को उत्तराखण्ड की राजनीति की मुख्य धारा मे लाने के लिए प्रयासरत है तो वही दूसरी ओर सत्ता की मलाई चाट रहे कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट है कि पार्टी से निकाल बाहर किए जाने के बाद भी यू.के.डी को तोडने पर जुटे है।
यहंा यह भी उल्लेखनीय है कि पहले काग्रेंस और अब भाजपा के साथ पींगे बढाने वाली यू.के.डी को चुनाव के नजदीक आते ही अपने अस्तित्व की याद आने लगती है। दल के नेताओ को सत्ता के साथ मलाई चटकाने की आदत पड चुकी है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव से ऐन पहले यह दल सत्ता से विमुख होकर अपनी ढपली अलग ही बजाना शुरू कर देते है। और चुनाव के बाद दो चार सीटे लाने पर यह राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के हमराही बन जाते है। वही दूसरी ओर यू.के.डी को राज्य आंदोलनकारी दल के रूप मे प्रदेश भर मे राज्य बनने के बाद अपार जन समर्थन मिला था। लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के साथ गलबहिया करते हुए यह दल राज्यवासियो के जेहन मे वह मुकाम नही बना पाई जिसकी कि  राज्यवासियो ने कल्पना की थी। क्षेत्रीय दल होने के कारण राज्यवासियो ने इस दल के प्रति अपनापन तो था ही साथ ही इस दल से यह उम्मीद भी थी कि यह दल राज्यवासियो के राज्य निर्माण के उदेदश्य को पूरा करेगा। लेकिन यह दल राज्यवासियो के मंसूबो पर खरा तो नही उतर पाया लेकिन इसके नेता जरूर अपने मंसूबो को मुकाम तक पहुचाने मे कामयाब रहे। इसका यह परिणाम हुआ कि राज्य निर्माण के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव मे इस दल को चार सीटे मिली थी और इसके  बाद हुए 2007 के चुनाव मे यह तीन सीटो पर आकर सिमट गई।
दल के अध्यक्ष बनने के बाद त्रिवेन्द्र पंवार ने दल को शक्ति के रूप् मे स्थापित करने के उदेदश्य से भाजपा सरकार से समर्थन वापस लेकर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की शुरूआत की। इसी क्रम मे उन्होने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करते हुए दल के सभी नेताओ से इस्तीफा देने की गुजारिश की। लेकिन सत्ता की मलाई चाट रहे चंद नेताओ को उनका यह फैसला रास नही आया और वे दल से बगावत कर गए। इस बगावत का यह परिणाम हुआ कि संगठन ने कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट को तो निष्कासित कर दिया और 12 अन्य भट्ट के हमराहियो को तीन दिन मे जवाब देने को कहा गया है कि वे अपना स्पष्टिकरण पार्टी को दे कि वे क्यों भट्ट के साथ राजभवन गए।

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2010 में निशंक सरकार ने कई आयामों को तो छुआ, लेकिन कई आरोपों को भी झेला

राजेन्द्र जोशी

देहरादून । मुख्यमंत्री निशंक की ताजपोशी के बाद विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भी नवोदित राज्य उत्तराखण्ड आज तक राज्य ने विकास के कई नये आयाम तो छुये ही हैं साथ ही प्रदेश ने संस्कृति व सास्ंकृतिक क्षेत्र में नये सोपानों को जोड़ा है। वहीं इस बीते साल में मुख्यमंत्री निशक को कई आरोपों में भी लपेटा गया, जिसमें उनकी कहीं भी सहभागिता नहीं पायी गयी, वहीं उच्चन्यायालय ने भी इस बात को माना कि सरकार में शामिल अधिकारियों ने सरकार को गुमराह कर सरकार से गलत कार्या करवाये।जबकि मुख्यमंत्री ने इन मामलों के संज्ञान में आते ही इन्हे तुरन्त निरस्त तक कर दिया। मसलन जलविद्युत परियोजनाओं के आंवंटन का मामला हो अथवा ऋषिकेश के चर्चित स्टर्डिया फैक्ट्री का मामला दोनों ही मामलो ंमें हो हल्ला मचाने वाली कांग्रेस को तो मंुह की खानी ही पड़ी वहीं पार्टी में ही उनके विरोधियों को न्यायालय के निर्णय ने चित्त कर डाला। कुल मिलाकर बीता वर्ष 2010 निशंक की विकास गाथा लिख गया। पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन के समय सेे अब तक प्रदेश ने अवस्थापना एवं सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। नवोदित राज्यों में तो उत्तराखण्ड शीर्षस्थ है ही, राष्ट्रीय स्तर के विकास सूचकांक में भी उत्तराखण्ड कई क्षेत्रों में अग्रणी बताया गया है 10 साल के इस नवोदित राज्य ने अपने 65 प्रतिशत वन और दुरूह भौगोलिकता के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक विकास दर में देश में तीसरा शीर्षस्थ राज्य होने का गौरव भी इसी साल हासिल किया है। प्रदेश की विकास दर राज्य बनने के समय 2.9 प्रतिशत थी। विकास दर में 3 गुना से अधिक वृद्धि करते हुए प्रदेश ने 9.5 प्रतिशत वृद्धि दर भी निशंक शासन काल में हासिल की है। वहीं आम आदमी का जीवन स्तर ऊंचा उठाने और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से संचालित करने के फलस्वरूप राज्य ने बीस सूत्री कार्यक्रम में देश में प्रथम स्थान हासिल किया है। पर्यटन में देश में अव्वल रहते हुए राज्य को केन्द्रीय योजना आयोग के अध्ययन के अनुसार घरेलू पर्यटकों की संख्या की दृष्टि से हिमालयी राज्यों में उत्तराखण्ड प्रथम स्थान पर तथा देश के समस्त राज्यों में सातवें स्थान पर रखा है। उत्तराखण्ड पूरे देश व दुनिया को प्राण वायु देता है साथ ही प्रदेश का 64 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र है। राज्य सरकार ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस कार्य किए हैं, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर योजना आयोग द्वारा भी सराहा गया है और योजना आयोग द्वारा अपने सर्वेक्षण में देश में बेहतर पर्यावरण संरक्षण के लिए उत्तराखण्ड को प्रथम स्थान पर रखा गया है। वहीं 108 सेवा को राज्य महिला आयोग, पुलिस सहायता और वन विभाग से जोड़ा गया। केन्द्रीय योजना आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार बैंकिंग सुविधा देने में राज्य में प्रति लाख जनसंख्या पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक शाखाओं का औसत 7.71 का है जो राष्ट्रीय औसत 4.51 की तुलना में काफी अधिक है। ग्रामीण विद्युतीकरण की दिशा में 96 प्रतिशत से अधिक ग्राम विद्युतीकृत किये जा चुके हैं, जो राष्ट्रीय औसत 82 प्रतिशत से बहुत अधिक है। राज्य सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में प्रभावी पहल की है। सरकार के इन प्रयासों की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना की गई है। रजिस्ट्रार जनरल, भारत सरकार द्वारा 2009 में कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखण्ड में जन्मदर 20.1 प्रति हजार है, जो राष्ट्रीय औसत 22.8 से कम है। इसी प्रकार मृत्युदर 6.4 प्रति हजार है, जो राष्ट्रीय औसत 7.4 से कम है। शिशु मृत्युदर 44 प्रति हजार है, जो कि राष्ट्रीय औसत 53 प्रति हजार की तुलना में काफी कम है। जहां एक ओर आज भी देश के कई प्रदेश बिजली की मार झेल रहे हैं वहीं उत्तराखण्ड ने बिजली की मांग के सापेक्ष आपूर्ति के लिए 7841 मिलियन यूनिट लक्ष्य के सापेक्ष 7765 मिलियन यूनिट की उपलब्धि हासिल करते हुए पूरे देश में राज्य ने दूसरा स्थान प्राप्त किया है।इतना ही नहीं गांव-गांव तक बिजली पहंुचाने के राज्य सरकार के संकल्प के तहत निर्धारित 47 गांव के लक्ष्य के सापेक्ष प्रदेश ने 65 गांव का विद्युतीकरण कर 138 प्रतिशत कार्य करते हुए पूरे देश में राज्य नें दूसरा स्थान प्राप्त किया है। वहीं राज्य सरकार ने वित्तीय नियोजन का परिचय देते हुए केन्द्रीय योजना आयोग से उत्तराखण्ड राज्य के लिए लगातार बढ़ी हुई वार्षिक योजना स्वीकृत कराने में सफलता प्राप्त की है। जहां वर्ष 2001-02 में योजना का आकार रूपये 1050 करोड़ था। वहीं वित्तीय वर्ष 2010-11 में बढ़कर रूपये 6800 करोड़ हो गया है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में राज्य को 360 करोड़ रूपये की अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता भी मिली है। प्रदेश सरकार के वित्तीय प्रबन्धन से प्रभावित होकर 13वें वित्त आयोग से वर्ष 2010 में 1000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रोत्साहन के रूप में मंजूर की गई है। राज्य गठन के समय लगभग 15 हजार रूपये प्रति व्यक्ति वार्षिक आय थी, जो वर्तमान में बढ़कर लगभग 42 हजार रूपये प्रति व्यक्ति हो गई है। राज्य सरकार ने अपने सीमित संसाधनों का उपयोग करते हुए आय के साधन बढ़ाए हैं। ऐसी विकासपरक योजनाएं शुरु की हैं, जिनसे रोजगार के अधिक अवसर मिल सके। इससे साबित होता है कि प्रदेश सरकार रोजगार व स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर प्रदेशवासियों की आमदनी में वृद्धि करने में सफल रही है। अपनी आय बढाने में भी राज्य के गठन बाद इन दस वर्षों में अपने राजस्व में अभूतपूर्व वृद्धि की है। राज्य गठन के समय जहां राजस्व प्राप्ति लगभग 200 करोड़ रूपये थी, वह आज बढ़कर 13342.45 करोड़ रूपये हो गई है। राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य मार्ग, मुख्य जिला मार्ग, ग्रामीण मोटर मार्ग, ग्रामीण हल्का वाहन मार्ग सहित वर्ष 2001-02 में कुल 982 किलोमीटर सडकें निर्मित थी। दस वर्षों में 21886 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया। सड़कों के लिए वर्ष 2001-02 में 170.16 करोड़ रूपये धनराशि का बजट स्वीकृत था, जबकि वर्ष 2010-11 तक 442.76 करोड़ रूपये की व्यवस्था की गई है। एक जानकारी के अनुसार वर्ष 2001-02 में कुल 84 पुल थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 742 हो गई है। अब तक सड़कों के निर्माण पर 5873.86 करोड़ रूपये धनराशि व्यय की गई है। उत्तराखण्ड में प्रचुर मात्रा में जड़ी-बूटियां, सगंध पादप, फलदार वृक्ष हैं। जिनके बेहतर दोहन से बेमौसमी सब्जी, फल, फूल आदि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि की गई है। जड़ी-बूटी की खेती के लिए इसकी लागत मूल्य का 50 प्रतिशत, अधिकतम एक लाख रूपये भौगोलिक जलवायु व जैविक विविधता वाले इस हिमालयी राज्य में विभिन्न फल, सब्जी, पुष्प व मसाला फसलों की और भी संभावनाएं तलाशी जा रही है। इतना ही नहीं जड़ी-बूटी को आमदनी का मजबूत जरिया बनाने के लिए ‘बागवानी विकास परिषद’ का गठन तक किया गया है राज्य सरकार ऊर्जा के क्षेत्र में राज्य को आत्म निर्भर बनाने के लिए प्रदेश सरकार ने जहंा वर्ष 2001-02 में 997 मेगावाट जल विद्युत उत्पादन बढ़कर वर्ष 2010-11 में 3100 मेगावाट कर दिया है। वहीं 35 सालों से लम्बित बहुउद्देशीय जमरानी बांध परियोजना ,लखवाड़-व्यासी जल विद्युत परियोजना पर भी कार्य शुरू किया जा चुका है। जबकि हिमाचल प्रदेश के सहयोग से किशाऊ बांध परियोजना के लिए प्रभावी पहल की गयी है। राज्य गठन के समय जहां 12563 (79ः) गांवों में बिजली थी, वहीं वर्ष 2010-11 में यह बढ़कर 15545 (98.6ः) गांवों तक पहुंच गई है। इसी तरह 16667 ऊर्जीकृत टयूबवेल/पम्पसेट अब वर्ष 2010-11 में बढ़कर 22277 हो गये हैं। लाइन लॉस में भी उल्लेखनीय कमी आई है। यह पूर्व में 53 प्रतिशत से घटकर अब 29 प्रतिशत रह गई है। राज्य गठन के समय 7240 ग्रामीण पेयजल योजनाएं, 112 नलकूप, 10282 हैण्डपम्प, 63 नगरीय पेयजल तथा 44 पम्पिंग योजनाएं थी। इन दस वर्षों में 1547 ग्रामीण पेयजल योजनाओं का कार्य पूर्ण तथा 23 ग्रामीण पेयजल योजनाओं का कार्य प्रगति पर है। इसी प्रकार 307 नलकूप, 104 मिनी नलकूप का निर्माण तथा अभावग्रस्त क्षेत्र में 10694 हैण्डपम्प स्थापित किये गए।पेयजल योजनाओं के लिए तब 96.57 करोड़ रूपये की धनराशि थी, जो वर्ष 2010-11 में बढ़कर 421.58 करोड़ रूपये हो गई है। राज्य गठन के समय औद्योगिक प्रगति दर 1.9 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 26 प्रतिशत हो गयी है। राज्य गठन के समय पंूजी निवेश 95 करोड़ रूपये था, जो अब बढ़कर 26,000 करोड़ रूपये पूंजी निवेश किया है । पंतनगर, हरिद्वार, सितारगंज एवं सेलार्कुइं में कई औद्योगिक आस्थान स्थापित किये गये हैं। राज्य गठन के समय 4202 लोगों को रोजगार के अवसर। इन दस वर्षों में लगभग 91443 लोगो को रोजगार के अवसर मिले हैं। उत्तराखण्ड राज्य में इन दस वर्षों में क्रांतिकारी बदलाव आया है। दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों की तैनाती की गई है। जीवनदायिनी 108 आपात सेवा शुरू हुई है। श्रीनगर बेस चिकित्सालय को मेडिकल कालेज बनाया गया है। हल्द्वानी फॉरेस्ट ट्रस्ट मेडिकल कॉलेज का राजकीकरण कर दिया गया है। अल्मोड़ा तथा देहरादून में भी मेडिकल कॉलेज प्रस्तावित हैं। राज्य गठन के समय 1525 उपकेन्द्र, 23 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 235 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र थे। अब बढ़कर 1847 उपकेन्द्र, 55 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 255 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हो गये है। प्रदेश का पहला बी.एससी. नर्सिंग कालेज भी देहरादून में शुरू हो गया है। पौड़ी, अल्मोड़ा, टिहरी तथा पिथौरागढ़ में भी नर्सिंंग कालेज की स्थापना की कार्यवाही चल रही है। उत्तराखण्ड का 64 प्रतिशत भू भाग वनाच्छादित है। इनमें विभिन्न राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव विहार हैं। राज्य गठन के बाद प्रदेश में सघन वृक्षारोपण करकेे हरित आवरण में वृद्धि की गई है। वृक्षारोपण में औषधीय व सगंध पादपों पर भी जोर दिया गया है। नक्षत्र व बद्रीश वन वाटिका की प्रभावी पहल की गई है। राज्य गठन के समय 6839 वन पंचायतें गठित थी, जो आज बढ़कर 12079 हो गई हैं। वर्ष 2000-01 में राष्ट्रीय पार्कों एवं वन्य जीव विहार में लगभग 67776 की तुलना में 2008-09 में लगभग 2 लाख 92 हजार 990 व्यक्ति भ्रमण के लिए आये हैं, जिनकी संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। राज्य सरकार के प्रयासों से कैम्पा योजना के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिए 830 करोड़ रुपये स्वीकृत। वहीं बाघों के संरक्षण के लिए राज्य सरकार द्वारा बाघ संरक्षण का कार्यक्रम शुरु किया गया, जिसके लिए देश के प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धोनी को ब्रांड एम्बेसडर नामित किया गया। राज्य सरकार ने हवाई सेवा से जोड़ा पर्यटन स्थलों को। हैली टूरिज्म को प्रोत्साहित किया गया। राज्य गठन के समय पर्यटन अवस्थापना सुविधाओं के लिए मात्र 34.76 करोड रूपये धनराशि की व्यवस्था थी। वर्ष 2010-11 में यह धनराशि बढ़कर 111.23 करोड़ रूपये हो गई है। राज्य बनने पर जहां देशी पर्यटकों की संख्या एक करोड़ 05 लाख थी, वहीं यह संख्या बढ़कर अब तक 2 करोड़ 31 लाख हो गई है। राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में शुरू की गई वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना में तब मात्र 62 उद्यमियों को लाभान्वित किया गया था, जिनकी संख्या अब बढ़कर 3147 हो गई है।वर्ष 2001-02 में जहां विदेशी पर्यटकों की संख्या 55 हजार थी, वहीं यह संख्या बढ़कर अब तक एक लाख़ 18 हजार हो गई है। पहली बार लगभग 21 हजार नौकरियों के द्वार वर्ष 2010 में स्थानीय बेरोजगारों के लिए खोले गये हैं, जिनमें 12 हजार समूह ‘ग’, 4 हजार शिक्षक तथा 490 विभिन्न औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में अनुदेशक के पद शामिल हैं। उत्तर प्रदेश से आने वाले 4 हजार पुलिस कर्मियों के स्थान पर स्थानीय चार हजार नौजवानों की भर्ती की जायेगी। राज्य सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लाखों की संख्या में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार-स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। वहीं स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार के बेहतर अवसर प्रदान करने के लिए विभिन्न विभागों में होने वाली समूह ‘ग’ की भर्ती के लिए अब राज्य के सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण अनिवार्य। समूह ‘ग’ के कई पद लोक सेवा आयोग की परिधि से बाहर। चयन प्रक्रिया में मुख्यतः उत्तराखण्ड की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक परिवेश से सम्बन्धित जानकारी की अनिवार्य की गयी है।हालांकि समूह ग की परीक्षा में गढवाली, कुमायूंनी तथा जौनसारी बोलियों के ज्ञान को हटाने से सरकार का विरोघ भी हुआ है। राज्य गठन के समय 2104 नहरें निर्मित थी, जो इन दस वर्षों में बढ़कर 2490 हो गई हैं। राज्य गठन से अब तब लघु सिंचाई में 12537.22 किलोमीटर सिंचाई गूल, 8909 सिंचाई हौज, 510 हाईड्रम निर्मित करते हुए जिससे 1,23,368 हेक्टेयर सिंचन क्षमता का सृजन हुआ है। वर्ष 2010 में प्रारम्भ इस योजना के अन्तर्गत प्रदेश के सभी राजकीय कर्मचारियों तथा अवकाश प्राप्त कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति की सुविधा निजी क्षेत्र की सहभागिता से क्रियान्वित की जायेगी। चयनित संस्था द्वारा राज्य के अन्दर एवं अन्य राज्यों में सरकारी/गैर सरकारी चिकित्सालयों को चिन्हित किया जायेगा, जिनमें राज्य कर्मचारी स्मार्ट कार्ड के माध्यम से चिकित्सा सुविधा प्राप्त कर सकंेगे। सरकारी भर्तियों में किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोकने के लिए कारगर कदम उठाये गये हैं। पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई है। समूह ‘ग’ के पदों में साक्षात्कार की व्यवस्था को समाप्त किया गया है। अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षा में उत्तर शीट की कार्बन प्रति परीक्षा के पश्चात अपने साथ ले जाने की अनुमति भी दी गई है। नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए परीक्षा परिणाम को वेबसाइट पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है, ताकि परीक्षार्थी कार्बन कॉपी से अपने अंको का मिलान कर सकंे। कृषि योजनाओं का सीधा लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिये ‘कृषक महोत्सव’ शुरू किया गया है। राज्य सरकार द्वारा किसानों के लिए खाद, बीज, कृषि उपकरण आदि के क्रय पर 50 से 90 प्रतिशत छूट की योजनाएं चलाई गयी हैं। गांव-गांव कृषक रथ के जरिये किसानों की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। गांवों के समग्र विकास को प्रतिबद्ध राज्य सरकार ने इस दिशा में नायाब पहल करते हुए यह अभिनव ‘अटल आदर्श ग्राम योजना’ शुरू की है। यह योजना राज्य स्थापना दिवस 9 नवम्बर, 2009 से शुरू की गई। इसके लिए 670 न्याय पंचायत मुख्यालय के ग्रामों को प्रथम चरण में चुना गया है। इस योजना में 16 विभागों को शामिल किया गया है और प्रत्येक विभाग को निर्धारित लक्ष्य दिये गये हैं। इन सभी विभागों के द्वारा ग्राम स्तर पर समस्त अवस्थापना सुविधाएं, मसलन बिजली, पानी, चिकित्सा स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल आदि मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेगी। जिन्हें इस वित्तीय वर्ष के अंत तक पूरा कर लिया जायेगा। उत्तराखण्ड में महिलाओं की अहम भूमिका है। राज्य आन्दोलन में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभायी। राज्य सरकार ने पहली बार महिलाओं को सम्मान देते हुए पंचायत स्तर पर उन्हें 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की है। समाज की बालिकाओं की स्थिति में समानता लाने, कन्या भ्रूण हत्या रोकने तथा बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन हेतु बी.पी.एल. परिवारों को जन्म के उपरान्त बालिका के पक्ष में 5000 रुपये की धनराशि जमा करने की व्यवस्था की गयी है। सरकार ने बी.पी.एल. परिवार की इंटरमीडिएट उत्तीर्ण बालिकाओं को 25 हजार रुपये की एफ.डी. देने का निर्णय लिया गया है। इससे बालिकाओं को उच्च शिक्षा में मदद मिलेगी। उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य है, जिसनें अपने पूर्व सैनिकों का अभूतपूर्व सम्मान दिया है। उत्तराखण्ड देश का ऐसा विशिष्ट राज्य है, जहां लगभग प्रत्येक परिवार से कोई न कोई सदस्य सेना में है। सैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों तथा उनके परिजनों को पूर्ण सम्मान प्रदान करने के उद्देश्य से अनूठी पहल शुरू की गई है। ‘जय जवान आवास योजना’ भी शुरू। इसके तहत बनने वाले आवास के लिए निःशुल्क भूमि देने का निर्णय लिया गया है, जो देश में एक अनूठी पहल है। पर्यावरण संरक्षण में भूतपूर्व सैनिकों की सहभागिता सुनिश्चित करने एवं उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने के लिये राज्य में चार इको टॉस्क फोर्स का गठन किया गया। कुल मिलाकर 2010 निशंक सरकार के लिए कई खट्टे मीठे अनुभव दे गया, साथ ही उन्हे यह शिक्षा भी दे गया कि जो भी कार्य वे करें अपनी दिल दिमाग से करें और अपने विश्वसनीय लोगों की राय पर न कि पार्टी व अपने इर्द गिर्द घूम रहे उन चाटुकारों के कहने पर जो केवल कुर्सी पर रहते हुए ही उनके साथ दिखायी दे रहे हैं।

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