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नेपथ्य की ओर जा रहे दल में जान फूंकने की कवायद

on जनवरी 6, 2011

राजेन्द्र जोशी

उत्तराखण्ड क्रंाति दल आजकल राजनीतिक गतिविधियो के चलते सुर्खियो मे है। दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पवंार जहा एक ओर अनुशासन का डंडा चलाते हुए नैपथ्य की ओर जा रहे दल को उत्तराखण्ड की राजनीति की मुख्य धारा मे लाने के लिए प्रयासरत है तो वही दूसरी ओर सत्ता की मलाई चाट रहे कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट है कि पार्टी से निकाल बाहर किए जाने के बाद भी यू.के.डी को तोडने पर जुटे है।
यहंा यह भी उल्लेखनीय है कि पहले काग्रेंस और अब भाजपा के साथ पींगे बढाने वाली यू.के.डी को चुनाव के नजदीक आते ही अपने अस्तित्व की याद आने लगती है। दल के नेताओ को सत्ता के साथ मलाई चटकाने की आदत पड चुकी है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव से ऐन पहले यह दल सत्ता से विमुख होकर अपनी ढपली अलग ही बजाना शुरू कर देते है। और चुनाव के बाद दो चार सीटे लाने पर यह राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के हमराही बन जाते है। वही दूसरी ओर यू.के.डी को राज्य आंदोलनकारी दल के रूप मे प्रदेश भर मे राज्य बनने के बाद अपार जन समर्थन मिला था। लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के साथ गलबहिया करते हुए यह दल राज्यवासियो के जेहन मे वह मुकाम नही बना पाई जिसकी कि  राज्यवासियो ने कल्पना की थी। क्षेत्रीय दल होने के कारण राज्यवासियो ने इस दल के प्रति अपनापन तो था ही साथ ही इस दल से यह उम्मीद भी थी कि यह दल राज्यवासियो के राज्य निर्माण के उदेदश्य को पूरा करेगा। लेकिन यह दल राज्यवासियो के मंसूबो पर खरा तो नही उतर पाया लेकिन इसके नेता जरूर अपने मंसूबो को मुकाम तक पहुचाने मे कामयाब रहे। इसका यह परिणाम हुआ कि राज्य निर्माण के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव मे इस दल को चार सीटे मिली थी और इसके  बाद हुए 2007 के चुनाव मे यह तीन सीटो पर आकर सिमट गई।
दल के अध्यक्ष बनने के बाद त्रिवेन्द्र पंवार ने दल को शक्ति के रूप् मे स्थापित करने के उदेदश्य से भाजपा सरकार से समर्थन वापस लेकर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की शुरूआत की। इसी क्रम मे उन्होने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करते हुए दल के सभी नेताओ से इस्तीफा देने की गुजारिश की। लेकिन सत्ता की मलाई चाट रहे चंद नेताओ को उनका यह फैसला रास नही आया और वे दल से बगावत कर गए। इस बगावत का यह परिणाम हुआ कि संगठन ने कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट को तो निष्कासित कर दिया और 12 अन्य भट्ट के हमराहियो को तीन दिन मे जवाब देने को कहा गया है कि वे अपना स्पष्टिकरण पार्टी को दे कि वे क्यों भट्ट के साथ राजभवन गए।
नेपथ्य की ओर जा रहे दल में जान फूंकने की कवायद
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 5 जनवरी। उत्तराखण्ड क्रंाति दल आजकल राजनीतिक गतिविधियो के चलते सुर्खियो मे है। दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पवंार जहा एक ओर अनुशासन का डंडा चलाते हुए नैपथ्य की ओर जा रहे दल को उत्तराखण्ड की राजनीति की मुख्य धारा मे लाने के लिए प्रयासरत है तो वही दूसरी ओर सत्ता की मलाई चाट रहे कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट है कि पार्टी से निकाल बाहर किए जाने के बाद भी यू.के.डी को तोडने पर जुटे है।
यहंा यह भी उल्लेखनीय है कि पहले काग्रेंस और अब भाजपा के साथ पींगे बढाने वाली यू.के.डी को चुनाव के नजदीक आते ही अपने अस्तित्व की याद आने लगती है। दल के नेताओ को सत्ता के साथ मलाई चटकाने की आदत पड चुकी है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव से ऐन पहले यह दल सत्ता से विमुख होकर अपनी ढपली अलग ही बजाना शुरू कर देते है। और चुनाव के बाद दो चार सीटे लाने पर यह राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के हमराही बन जाते है। वही दूसरी ओर यू.के.डी को राज्य आंदोलनकारी दल के रूप मे प्रदेश भर मे राज्य बनने के बाद अपार जन समर्थन मिला था। लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक दलो के साथ गलबहिया करते हुए यह दल राज्यवासियो के जेहन मे वह मुकाम नही बना पाई जिसकी कि  राज्यवासियो ने कल्पना की थी। क्षेत्रीय दल होने के कारण राज्यवासियो ने इस दल के प्रति अपनापन तो था ही साथ ही इस दल से यह उम्मीद भी थी कि यह दल राज्यवासियो के राज्य निर्माण के उदेदश्य को पूरा करेगा। लेकिन यह दल राज्यवासियो के मंसूबो पर खरा तो नही उतर पाया लेकिन इसके नेता जरूर अपने मंसूबो को मुकाम तक पहुचाने मे कामयाब रहे। इसका यह परिणाम हुआ कि राज्य निर्माण के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव मे इस दल को चार सीटे मिली थी और इसके  बाद हुए 2007 के चुनाव मे यह तीन सीटो पर आकर सिमट गई।
दल के अध्यक्ष बनने के बाद त्रिवेन्द्र पंवार ने दल को शक्ति के रूप् मे स्थापित करने के उदेदश्य से भाजपा सरकार से समर्थन वापस लेकर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की शुरूआत की। इसी क्रम मे उन्होने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करते हुए दल के सभी नेताओ से इस्तीफा देने की गुजारिश की। लेकिन सत्ता की मलाई चाट रहे चंद नेताओ को उनका यह फैसला रास नही आया और वे दल से बगावत कर गए। इस बगावत का यह परिणाम हुआ कि संगठन ने कबिना मंत्री दिवाकर भट्ट को तो निष्कासित कर दिया और 12 अन्य भट्ट के हमराहियो को तीन दिन मे जवाब देने को कहा गया है कि वे अपना स्पष्टिकरण पार्टी को दे कि वे क्यों भट्ट के साथ राजभवन गए।

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